महाराष्ट्र में हादसा
औरंगाबाद में हुए रेल हादसे का दृश्य।

नई दिल्ली। औरंगाबाद के रेल हादसे ने पूरी दुनिया को विचलित कर दिया। 16 लोग गांव के लिए पैदल चले थे। भूख-प्यास से लड़ रहे इन लोगों को थकावट इतनी ज्यादा हो गयी कि उनको रेल पटरियों और घर की चारपाई के बीच के अंतर का अहसास भी नहीं हुआ। वे रेल पटरियों पर सो गये और आखिर में इतनी गहरी नींद में सो गये कि वे कभी भी पुन: उठ नहीं पायेंगे। यह हादसा देश की नौकरशाही की संवेदनहीनता को भी उजागर करता है। लॉकडाउन के बाद हालात की गंभीरता ने समझ पाने के लिए राज्य सरकारों को भी कटघरे में खड़ा करता है।

औरंगाबाद रेल पटरियों पर मालगाड़ी के नीचे कटकर 16 जने मारे गये। अगर हम घटना को एक पाठक, एक आम देशवासी की नजर से देखें तो इसमें न तो रेलवे विभाग की लापरवाही सामने आती है। न मालगाड़ी के चालक की और न ही औरंगाबाद प्रशासन और न ही महाराष्ट्र सरकार की। अगर लापरवाही उजागर होगी तो उन मजदूरों की जो इस दुनिया में नहीं है और अपनी पीड़ा को नहीं बता सकते कि आखिर वे क्यों सैकड़ों किमी का सफर तय करने के लिए पैदल ही भीषण गर्मी के बीच में निकल पड़े? क्या उनको रास्ते में होने वाली छोटी-छोटी पीड़ा का अहसास नहीं था। संभवत: इसका उत्तर यह है, था। किंतु बीमारी का भय, राज्य सरकार की अनदेखी से उपजी असुरक्षा की भावना और भूख ने उस पीड़ा के अहसास को छोटा कर दिया था। लॉकडाउन की अवधि 19 दिन रखी गयी तो मजदूर इंतजार कर बैठे रहे। पहला लॉकडाउन समाप्त हुआ तो दूसरा चालू हो गया। दूसरा खत्म हुआ तो तीसरा चालू हो गया। लगभग 50 दिन गुजर गए।

कोरोना का कहर समाप्त नहीं हो रहा और लॉकडाउन से पूरी तरह देश कब बाहर आ पायेगा, यह कोई नहीं कह सकता। अनेक राज्यों में निवास करने वाले लाखों नहीं करोड़ों श्रमिक, जो सुबह कमाकर लाते थे और शाम को खाना खाते थे। अगर कुछ बच गया तो गांव में अपने गरीब मां-बाप को भेजकर उनकी मदद कर रहे थे, जो उनका गांव में इंतजार करते थे और वे उनसे मिलने के लिए होली-दीवाली ही जा पाते थे। अब कभी नहीं जा पा पायेंगे।

दो माह से रोजगार मिलने का इंतजार कर रहे थे। न तो रोजगार मिला। न ही राज्य सरकारों की ओर से की गयी सहायता घोषणाओं का लाभ इन लोगों तक पहुंचा। न ही ये रोजगार स्थल पर मतदाता बन पाये थे। इस कारण राजनीतिक दलों को मजदूरों की न चिंता थी और न ही, है।

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काम धंधे बंद होने के बाद जो भी बचा था, उससे मकान का किराया भी दिया था और बच्चों आदि को भोजन भी करवाया था। अब श्रमिकों के पास दो ही चारे रह गये हैं, वे दया का पात्र बनकर भूख से लड़ें अथवा पैदल अपने गांव की ओर रवाना हों।

मजदूरों के पलायन के समाचार को जिस प्रमुखता के साथ दिखाया जाना चाहिये था और संबंधित राज्य सरकारों के दावों की जानकारी और हकीकत जनता तक पहुंचाया जाना चाहिये था, वह नहीं पहुंचाया जा सका। मजदूर पलायन कर रहे हैं। कोई ट्रक के नीचे आकर मर रहा है। कोई साइकिल चलाता हुआ भूख से मर रहा है। कोई समाचार नहीं है। किसी को कोई चिंता नहीं है। किस नेता ने क्या कहा, यह सुबह से लेकर शाम तक टीवी पत्रकारों की खबर होती है। उनको न गरीब का दुख दिखायी दे रहा है। न पैदल चल रहे श्रमिकों की आवाज सुनाई दे रही है।

राज्य सरकारों की मांग पर स्पैशल ट्रेन को चलाया गया किंतु केन्द्र सरकार स्तर पर मजदूरों के रजिस्ट्रेशन की व्यवस्था नहीं की गयी और इसको दो राज्य की सरकारों के भरोसे छोड़ दिया गया।

रेलमंत्रालय की वेबसाइट पर ही रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया को आरंभ किया गया होता तो इससे मजदूरों को अपने घर तक पहुंचना, इतना दुर्लभ और पीड़ादायक नहीं लगता।

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रेल मंत्रालय अपनी लापरवाही से बच नहीं सकता। यह नहीं भूलना चाहिये कि जो मजदूर अपने घर से सैकड़ों किलोमीटर दूर 300-400 रुपये की दिहाड़ी करने के लिए आया है, उसके पास किस तरह के संसाधन होंगे। अगर उसके पास संसाधन होते तो वह इतनी दूर श्रम के लिए कम से कम नहीं जाता।

औरंगाबाद रेल हादसा एक सामान्य घटना प्रतीत हो सकती है किंतु इसके पीछे जो नौकरशाही की लापरवाही उजागर हुई है, उसको किसी ने पर्दे पर लाने का प्रयास नहीं किया है। नौकरशाही से यह सवाल नहीं किया गया कि मजदूर पलायन कर रहे हैं तो उनको रोकने का प्रयास क्यों नहीं किया गया? उन्होंने रजिस्ट्रेशन करवाया था तो उनकी समस्या को क्यों नहीं सुना गया? उनकी समस्या समाधान के लिए जिला स्तर पर क्या व्यवस्थाएं की गयी हैं? ऑनलाइन प्रक्रिया मुश्किल है तो ऑफलाइन उनसे आवेदन लेकर उनको क्यों नहीं रजिस्टर्ड किया गया? मजदूरों से मकान मालिक किराया ले रहे हैं तो उनसे समझाइश क्यों नहीं की जा रही? मजदूरों के पास राशन नहीं है तो क्यों नहीं राशन उनके पास पहुंचाया गया?

ब्यूरोक्रेट्स केन्द्र सरकार के प्रतिनिधि होते हैं और सरकार सीधे उनसे सवाल कर सकती है। अगर सीधे सवाल नहीं कर सकती तो औरंगाबाद की घटना के बाद सरकार को यह भी बदलाव करना चाहिये कि केन्द्र सरकार के आदेशों की पालना करना भी उनके लिए उतना ही आवश्यक है जितना संबंधित कैडर की सरकार के।

नौकरशाही के भरोसे 130 करोड़ लोगों को नहीं छोड़ा जा सकता। उनकी लापरवाही ने आज 16 लोगों की जान ली है। अगर ब्यूरोक्रेट्स की जवाबदेही सुनिश्चित नहीं की जाती है तो क्या कोई सरकार यह भरोसा दे सकती है कि फिर कभी पलायन के कारण हादसा नहीं होगा। किसी भूखे गरीब की जान नहीं जायेगी।

इस हादसे के बाद भी पलायन थमा नहीं है। मजदूरों को एक बार उनके घरों तक पहुंचाने के लिए अगर केन्द्र सरकार को स्पैशल गाडियों की संख्या बढ़ानी पड़े तो उसको बढ़ाया जाना चाहये । कोरोना से इतने लोगों की मौत नहीं होती जितनी गर्मी के इस मौसम में भूख, प्यास और हादसो में हो रही है।