प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी
नरेन्द्र मोदी और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प।

नई दिल्ली/वाशिंगटन। भारत और चीन के बीच सोमवार-मंगलवार रात को जो झड़प हुई, वह क्या अक्समात थी? यह सवाल लाखों नहीं करोड़ों लोगों के दिलों में उठ रहा होगा और वे इसका उत्तर भी तलाशने में जुटे होंगे।

लद्दाख की गलवान घाटी में भारतीय सैनिकों को पहले वार्ता के लिए बुलाया गया और जब वे सहज भाव से वार्ता कर रहे थे तो उन पर पत्थरों, लाठियों और तेजधार हथियारों से हमला कर दिया गया। जवाबी कार्यवाही में चीन के भी 43 सैनिक हताहत हो गये, जैसा कि एएनआई समाचार एजेंसी ने बताया है।

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वहीं भारतीय सेना ने अपने 20 महान सैनिक खो दिये। उनकी शहादत को सभी देशवासी नमन कर रहे हैं। देश के लिए दिये गये उनके बलिदान को भुलाया नहीं जा सकेगा।

चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग स्वयं पर नियंत्रण खो बैठे हैं। यह पहले भी कई बार नजर आया है और वे चीन को एक ऐसा देश बनाने का सपना देख रहे हैं, जो दुनिया को थर्ड वर्ल्ड वार की ओर ले जा रहा है।

चीन दुनिया के प्रति कितनी गहरी साजिश रच रहा है, इसका एक नहीं अनेक प्रमाण सामने आ रहे हैं। भारतीय सैनिकों को पहले वार्ता के लिए बुलाना और फिर उन पर हमला करना बाद में यह कहना कि भारतीय सैनिकों ने एलएसी को पार किया। उसकी साजिश को बेनकाब करता है। अगर भारतीय सैनिक सीमा पार कर जाते तो चीन को अपने सैनिकों के शव गिनने के लिए भी मशक्कत करनी पड़ती। भारतीय सेना के शौर्य को पूरी दुनिया सलाम करती है। इस सेना ने पाकिस्तान में जो किया, उसके बारे में चीन को इमरान खान से पूछ लेना चाहिये।

सेना ने जारी किया बयान :

भारतीय सेना ने मंगलवार देर रात एक आधिकारिक बयान जारी कर कहा, ”भारत और चीन की सेना गलवान इलाक़े से पीछे हट गई हैं। 15/16 जून की रात यहीं पर दोनों देशों के सैनिकों के बीच झड़प हुई थी। झड़प और गतिरोध वाले इलाक़े में ड्यूटी के दौरान 17 भारतीय सैनिक गंभीर रूप से ज़ख़्मी हो गए थे। शून्य डिग्री से भी नीचे तापमान और बेहद ऊंचाई वाले इस इलाक़े में गंभीर से रूप ज़ख़्मी इन 17 सैनिकों मौत हो गई. यहां कुल 20 भारतीय सैनिकों की मौत हुई है। भारतीय सेना देश की अखंडता और संप्रभुता की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है।”

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भारत का चीन पर आरोप

इस घटना के बाद भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अनुराग श्रीवास्तव ने पत्रकारों के सवालों के जवाब देते हुए कहा, “छह जून को सीनियर कमांडरों की बैठक काफ़ी अच्छी रही थी और उसमें तनाव कम करने की प्रक्रिया पर सहमित बनी थी। इसके बाद मौक़े पर मौजूद कमांडरों की बैठकों का भी सिलसिला चला था ताकि उस सहमति को ग्राउंड लेवल पर लागू किया जा सके जो वरिष्ठ अधिकारियों के बीच बनी थी।” श्रीवास्तव ने आगे कहा, “हमें उम्मीद थी कि सब कुछ आसानी से हो जाएगा लेकिन चीनी पक्ष इस सहमति से हट गया कि गलवान घाटी में लाइन ऑफ़ एक्चुअल कंट्रोल (एलएसी) का सम्मान किया जाएगा।15 जून की देर शाम और रात को एक हिंसक झड़प हुई, इसकी वजह ये थी कि चीनी पक्ष ने एकतरफ़ा तरीक़े से मौजूदा स्थिति को बदलने की कोशिश की। दोनों तरफ़ से लोग हताहत हुए, जिसे टाला जा सकता था अगर चीनी पक्ष ने उच्च स्तर पर बनी सहमति ठीक तरह से पालन किया होता।”

चीन ने दी सफाई

पड़ोसी देश चीन की सरकारी समाचार एजेंसी शिन्हुआ के मुताबिक़ पीपल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) के पश्चिमी थिएटर कमांड के प्रवक्ता चांग शुइली का बयान पीएलए के आधिकारिक वीबो अकाउंट पर पोस्ट किया गया है। इस बयान में चांग ने कहा है कि भारत सख़्ती से अपने सैनिकों को रोके और विवाद ख़त्म करने के लिए संवाद के सही रास्ते पर आगे बढ़े।

भारत को दी थी चेतावनी

चीन ने कुछ समय पहले यह भी बयान दिया था कि भारत जी-7 ग्रुप का सदस्य बनना चाहता है, भारत को ऐसा नहीं करना चाहिये। उसका कहना था कि वह जी-7 ग्रुप को अपने हितों के खिलाफ मानता है। उल्लेखनीय है कि पिछले वर्ष फ्रांस में आयोजित जी-7 सम्मेलन में पीएम श्री मोदी ने भाग लिया था और इस साल यह सम्मेलन अमेरिका में आयोजित किया जा रहा है, जिसमें राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को आमंत्रित किया था। श्री ट्रम्प भारत के साथ-साथ दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया को भी इसका सदस्य बनाना चाहते हैं। रूस को आमंत्रित करने को लेकर कनाडा व ब्रिटेन ने अपनी आपत्ति जतायी थी।

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थर्ड वर्ल्ड वॉर की तरफ जा रही दुनिया?

मंगलवार दोपहर तक यह खबर दुनिया तक पहुंच रही थी, उसी दौरान चीन के मित्र देश उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग उन ने दक्षिण कोरिया के एक दफ्तर को उड़ा दिया। यह दफ्तर उत्तर और दक्षिण कोरिया की सीमा पर था। किम जोंग उन ने दिखा दिया कि वह भारत और अमेरिका के मित्र देश दक्षिण कोरिया के साथ अपने सभी सम्पर्क काट रहा है। इसके कुछ समय बाद ही दक्षिण कोरिया की तरफ जाने वाली संचार सेवाओं को भी बंद कर दिया गया। ध्यान रहे कि उत्तर कोरिया और चीन में वामपंथी पार्टियों का राज है। दोनों ही देशों में न लोकतंत्र, न स्वतंत्र मिडिया है। किम जोंग उन अपने देश के अलावा अगर किसी देश की यात्रा पर जाते हैं तो वह चीन है। वे उत्तर कोरिया से स्पैशल रेलगाड़ी लेकर चीन तक का सफर तय करते हैं। दोनों देशों के बीच रेल सम्पर्क बना हुआ है। हजारों लोग चीन में कार्य करने के लिए आते हैं क्योंकि उत्तर कोरिया पर वैश्विक आर्थिक प्रतिबंध हैं।

अमेरिका में फैलाई अराजकता

अगर अमेरिका में अनियंत्रित कोरोना वायरस की चर्चा की जाये तो यह न्यूयार्क शहर में ही सबसे पहले सामने आया। न्यूयार्क वो शहर है, जहां चीनी नागरिक बड़ी संख्या में रहते हैं। यह भी नहीं भूलना चाहिये कि चीन के वुहान शहर से ही कोरोना वायरस बाहर निकला था।

अमेरिका को लगभग एक माह तक लॉकडाउन की स्थिति से गुजरना पड़ा, जो इससे पहले कभी उसका इतिहास नहीं रहा। अमेरिकी अर्थव्यवस्था को चोट पहुंचाने का यह प्रयास था क्योंकि 3 नवंबर को राष्ट्रपति पद के चुनाव होने हैं।

संयुक्त राज्य अमेरिका अभी लॉकडाउन से बाहर भी नहीं आ पाया था कि पुलिस हिरासत में मौत के मामले को सोशल मीडिया पर जमकर वायरल किया गया और फिर हिंसक आंदोलन आरंभ कर दिये गये। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने कहा, एंटी फॉसिस्ट (एंटीफा) को प्रतिबंधित करने की चेतावनी दी क्योंकि आंदोलन यही संगठन चला रहा था। इसकी जड़ें पहले जर्मनी में थीं और धीरे-धीरे इसने यूरोप व अमेरिका में अपने पांव पसारे।

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वहीं डोनाल्ड ट्रम्प का चुनाव प्रचार बाधित करने के लिए योजनाबद्ध तरीके से हिंसक आंदोलन चलाया गया। पुलिस विभाग को खत्म करने की अनोखी मांग रखी गयी। श्री ट्रम्प ने भी चीनी योजनाओं को करारा जवाब दिया और उन्होंने आज पुलिस विभाग में बदलाव के लिए एक कार्यकारी आदेश पर दस्तखत कर दिये। इस तरह से डेमोक्रेटिक पार्टी लोगों को भड़काकर सड़क पर नहीं ला सकेगी। श्री ट्रम्प ने यह भी कहा कि वे सभी लोगों के लिए एक समान कार्य करना चाहते हैं। मंगलवार को व्हाइट हाउस में बोलते हुए, श्री ट्रम्प ने यह कहते हुए संबोधन शुरू किया कि वह कई अफ्रीकी अमेरिकी परिवारों से मिले थे, जिन्होंने अपने प्रियजनों को खो दिया था, जिनमें एंटोन रोज़ , बॉथम जीन और अहमद एर्बे के रिश्तेदार शामिल थे। श्री ट्रम्प ने कहा कि एक मजबूत और सुरक्षित समाज की स्थापना पुलिस के बिना संभव नहीं है। उन्होंने कहा, जहां पुलिस नहीं होती, वहां अराजकता होती है। हमें अपने पुलिस कर्मचारियों के सम्मान के लिए खड़ा होना चाहिये। दूसरी ओर चीन को विश्व की आर्थिक महाशक्ति बनाने में मुख्य भूमिका निभाने वाले बराक ओबामा अब जोई बिडेन के लिए खुलकर प्रचार करने का एलान करने लगे हैं।

शी जिनपिंग का खतरनाक सपना

शी जिनपिंग कितनी खतरनाक योजनाएं चल रहा है, इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि नेपाल ने भारतीय क्षेत्र को अपने नक्शे में शामिल करते हुए उसका संसद में प्रस्ताव पारित कर दिया। वह क्षेत्र जो दशकों नहीं बल्कि सदियों से भारत की पहचान है। पिछले साल अक्टूबर में शी जिनपिंग ने नेपाल की यात्रा की थी और उसको आर्थिक मदद का एलान किया था। नेपाल में इस समय कम्युनिस्ट पार्टी वाली पार्टी की सरकार है। इससे चीन दुनिया में यह तस्वीर पेश करना चाहता है कि, भारत के सभी पड़ोसी देशों के साथ विवाद है। वहीं नेपाल यह भूल गया कि उसके गरीब लोगों को बिना वीजा भारत में आने की छूट है। यहां उसके लाखों लोग काम कर रहे हैं। सरकारी नौकरियों में उनको रखा जाता रहा है। चीन में उनको यह सहूलियत कभी नहीं मिलेगी।

राष्ट्रपति बनने के बाद से ही शी जिनपिंग लगातार दक्षिण एशिया में अपने पांव पसारता जा रहा था। उसने पाकिस्तान को आर्थिक दबाव में लिया। इसके उपरांत चीन ने श्रीलंका, बांग्लादेश और म्यांमार तक अपनी अप्रोच को बढ़ाया। इन सभी देशों को बुनियादी ढांचे के विकास के नाम पर लोन दिया गया और इन सभी कार्यों का ठेका भी चीन की ही कंपनियां को दिया गया। इस तरह से चीन इन देशों में अपनी सहूलियत के अनुसार नक्शे बना रहा है। उसके अनुसार काम कर रहा है। सत्ताधारी दलों के नेताओं को व्यक्तिगत रूप से क्या लाभ हो रहा है, यह वहां की जनता बेहतर जानती होगी।

श्रीलंका के एक बड़े हिस्से को चीन ने लीज पर भी ले लिया है अर्थात वहां पर उसका कब्जा हो गया है। अभी अस्थायी है। क्या यह माना जा सकता है कि श्रीलंका जैसा छोटा देश कभी अपनी जमीन को विशाल देश- चीन से मुक्त करवा पायेगा।

जापान, दक्षिण कोरिया, वियतनाम, ताइवान, फिलिपिन्स जैसे एशियान के देश भी चीन की नीतियों से खासे परेशान नजर आते रहे हैं क्योंकि दक्षिण चीन सागर में भी शी जिनपिंग की सेना ने निर्माण कार्य कर लिये हैं। ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन भी चाहते हैं कि चीन अपनी दादागिरी की भूमिका को समाप्त करे। विश्व को बर्बादी के कगार तक पहुंचाने वाले कोरोना वायरस दुनिया तक कैसे पहुंचा, इसकी जांच की मांग करने वाले मॉरिसन दुनिया के पहले नेता थे। हालांकि जर्मनी ने उनके खिलाफ मुआवजा के लिए रिट लगायी गयी थी।

छल कपट से दुनिया को अचंभित करने वाले चीन पर अमेरिकी कंपनियां भी विश्वास नहीं कर रही हैं। अमेरिकी विदेश मंत्री माइकल पोम्पियो भी कह चुके हैं कि चीन ने अमेरिकी कंपनियों के बौदि्धक सम्पदा के अधिकारों का हनन किया है मतलब साफ है कि अमेरिकी कंपनियों की टैक्नालॉजी को चीन ने चोरी किया।