नरेन्द्र मोदी और डोनाल्ड ट्रम्प
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प। फाइल फोटो

अधिकांश देशों में बाजार, होटल, सिनेमाघर बंद हैं। रेस्टोरेंट पर भी ताले हैं। पर्यटन स्थल वीरान पड़े हैं। विश्व के सभी प्रमुख धार्मिक स्थलों के कपाट बंद हैं, जहां करोड़ों लोग आस्था को नमन करने के लिए रोजाना जाते रहे हैं। सभी देशों में अब एक समानता हो गयी है कि लोग घरों में कैद हैं। कोरोना वायरस से होने वाली मौत पर चिंता व्यक्त कर रहे हैं। उनके मोहल्ले में पुलिस चौकसी कर रही है कि कोई भी बाहर नहीं निकले।

नई दिल्ली। मैक्डोनल्ड का पीजा स्टोर, एप्पल के कम्प्यूटर-मोबाइल तैयार करने के कारखाने हो या एफ-16 जैसे आधुनिक विमान बनाने वाली बोइंग कंपनी के वर्कशॉप अथवा भारत में फुटपाथ पर लगी चाय की स्टॉल हो, सब बंद हैं। कोरोना वायरस के भय ने अमीर और गरीब के भेद को समाप्त करते हुए सभी को बेरोजगार बना दिया।

न्यूयार्क और सिंगापुर जैसे विश्व के आधुनिक शहरों के होटल में बने लग्जरी सुइट वीरान हैं। बिना बुकिंग ठहरने की सुविधा है, किंतु विजीटर नहीं हैं। एयरपोर्ट पर उड़ान भरने के लिए हवाई जहाज तो हैं, लेकिन यात्री नहीं है। सौ-सौ मंजिल वाले होटल-टावर सुनसान हैं, जिन पर ताला लगे हैं। हकीकत यह भी है कि जहां ताले नहीं लगे हैं, वहां कोई चोरी करने वाला भी नहीं है। मालिक भी घर में कैद है और चोर की भी हालत वही है। सब अदृश्य रोग रूपी दुश्मन (कोरोना वायरस) से भयभीत हैं।

नाटो और जी-7 जैसे वैश्विक संगठनों के सदस्य देश अमेरिका, जर्मन, फ्रांस में लोग घरों में कैद हैं। यही हालत तीसरी दुनिया के देश बांग्लादेश, भूटान आदि की है।

अमेरिका की ताकत विज्ञान रहा है जिसके आधार पर उसने आधुनिक हथियार बनाये और सर्वशक्तिमान बन गया। वह भी संक्रामक रोग कोरोना का इलाज नहीं तलाश पा रहा है।

विश्व की लगभग 7 अरब की आबादी में से 5 अरब की आबादी अपने घरों में कैद होकर रह गयी है। इनमें चीन, भारत, नेपाल, बांग्लादेश के साथ-साथ विकसित अमेरिका, जर्मन, फ्रांस, इंग्लैण्ड, इटली, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैण्ड सहित 100 से अधिक देश शामिल हैं।

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अधिकांश देशों में बाजार, होटल, सिनेमाघर बंद हैं। रेस्टोरेंट पर भी ताले हैं। पर्यटन स्थल वीरान पड़े हैं। विश्व के सभी प्रमुख धार्मिक स्थलों के कपाट बंद हैं, जहां करोड़ों लोग आस्था को नमन करने के लिए रोजाना जाते रहे हैं। सभी देशों में अब एक समानता हो गयी है कि लोग घरों में कैद हैं। कोरोना वायरस से होने वाली मौत पर चिंता व्यक्त कर रहे हैं। उनके मोहल्ले में पुलिस चौकसी कर रही है कि कोई भी बाहर नहीं निकले।

पूर्व में हड़ताल के समय ही कारखाने और बाजार बंद हुआ करते थे और पुलिस व प्रशासनिक अधिकारी उनको खुलवाने के लिए प्रयास करती थी। आज विश्व भर में स्थिति पलट गयी है। लोगों को घर में रहने के फायदे बताये जा रहे हैं।

उच्च आय वर्ग वाला व्यक्ति पहले सरकारी अस्पताल में जाने से बचने का प्रयास करता था, आज उसको पता है कि कोरोना का इलाज सिर्फ राजकीय चिकित्सालयों में ही है। अभी तक इस रोग की जांच सिर्फ सरकारी लैब में ही संभव है।

कैंसर और हृदय रोग जैसे जानलेवा रोग में आय भेद सामने आ जाता रहा है। विकसित देश के डॉक्टर भारी-भरकम फीस लेकर आधुनिक तकनीक की मदद से इन रोगों का आसानी से इलाज कर दिया करते हैं जबकि निम्न आय वर्ग वाला व्यक्ति इतनी अप्रोच नहीं रखता और वह सरकारी सेवाओं तक ही सीमित होकर रह जाता रहा है। परिवार के सदस्य की मृत्यु को भी वह भगवान की मर्जी मानकर स्वीकार कर लेता था जबकि उसके मन में यह मलाल अवश्य होता था कि अगर वह भी खास वर्ग में शामिल होता तो वह अपने प्रियजन को बचा सकता था। भारत में अनेक राजनीतिक परिवार छोटी-बड़ी बीमारी पर भी दूसरे देशों में जाकर इलाज करवाते रहे हैं। जबकि उनके परिवार के सदस्य राष्ट्रीय राजनीति में सालों तक रहे, किंतु इसके बावजूद वे भारत की चिकित्सा सेवाओं को विश्वस्तरीय नहीं बना पाए अथवा बनाना ही नहीं चाहते थे।

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डोनाल्ड ट्रम्प और उनके मंत्री यह स्वीकार नहीं करते हों किंतु एक दर्दभरी सच्चाई यह भी है कि अमेरिका एक खास वर्ग का ही देश है। विकसित देश की श्रेणी में आने वाले ऑस्ट्रेलिया, जापान, जर्मन, फ्रांस, सिंगापुर आदि लोग तो बिना वीजा भी अमेरिका की यात्रा कर सकते हैं जबकि भारत और चीन जैसे देशों के लोगों को टूरिस्ट व एज्युकेशन वीजा देने से पहले अमेरिकी विदेश मंत्रालय के अधिकारियों की ओर से इंटरव्यू लिया जाता है। बैंक खातों से उनकी आर्थिक स्थिति की समीक्षा की जाती है। पहले वह सुनिश्चित कर लेता है कि भारत और चीन जैसे देशों में रहने के बावजूद व्यक्ति कम से कम लखपति तो है।

अमेरिका, इटली, जर्मन, फ्रांस आदि देश जी-7 और नाटो जैसे संगठनों में एक साथ काम करते हैं। तकनीक, मेडिकल एज्युकेशन में एक-दूसरे का सहयोग किया जाता है। चिकित्सा उपकरण में भी अमेरिका इन देशों की हर प्रकार मदद करता रहा है। यूरोपीय देशों की यूनियन पर यूएसए का दबदबा हमेशा ही दुनिया महसूस करती रही है। अमेरिका और यूरोपीय देश एक-दूसरे के पूरक देश माने जाते हैं। यह सभी देश सैक्युलर हैं किंतु हर रविवार का राष्ट्रीय अवकाश इसलिए होता है क्योंकि इन देश के बहुसंख्यकों को चर्च घर में जाकर प्रार्थना में भाग लेना होता है। होली-दीपावली पर इन देशों में अवकाश नहीं होता किंतु गुड फ्राइडे और क्रिसमिस को सरकारी छुटि्टयां अवश्य होती हैं ताकि ज्यादा संख्या वाले वर्ग अपने परिवार के साथ धार्मिक कार्यक्रम में भाग ले सकें। फिर भी यह देश सैक्यूलर हैं।