महादुर्गा
महादुर्गा की पूजा करती महिलाएं। फाइल चित्र

20 जून 2020 देश में कोरोना मरीजों की संख्या लगभग 4 लाख थी। रोजाना 15 हजार संक्रमित सामने आ रहे थे। 21 जून को सूर्य ग्रहण लगना था। उस दिन ज्योतिष विद्या के सुपर स्पैशलिस्ट से जानकारी जुटाकर सांध्यदीप की ओर से लेख प्रकाशित किया गया था कि सूर्य ग्रहण का असर कोरोना पर भी नजर आयेगा और विश्व भर में कोरोना रोगियों की संख्या में इजाफा होगा। उस समय तक अमेरिका में कोरोना रोग पर लगभग नियंत्रण पा लिया गया था। ऑस्ट्रेलिया और यूरोप के बहुत से देश भी अनलॉक की प्रक्रिया आरंभ कर चुके थे। आज आप देख लिजिये, भविष्यवाणी कितनी सच साबित हुई। अमेरिका, ईरान और यूरोप के बहुत से दूसरे देशों में कोरोना का दूसरा दौर आरंभ हो गया है। भारत में भी मरीजों की संख्या 15 हजार से बढ़कर 30 हजार हो गयी है। 9 लाख के आकड़े को पार किया जा चुका है और संभव है कि कल गुरुवार तक देश में कोरोना संक्रमितों की संख्या 10 लाख के मनोवैज्ञानिक आकड़े को छू ले।

21 जून को एक वामपंथी विचारधारा वाले पत्रकार और उसका टीवी चैनल एक फर्जी ज्योतिष विद्या के जानकार को बैठाकर यह साबित करने की नाकाम कोशिश कर रहा था कि ज्योतिष विद्या कभी किसी जमाने की विद्या थी आज इसका महत्व नहीं है।

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यह सच है कि पूर्व काल में ज्योतिष विद्या सैटेलाइट से भी ज्यादा सटीक जानकारी प्रदान करती थी। इसके बाद मुगल आक्रमण, अंग्रेजी हुकूमत और बाद में अन्य कुछ सरकारों ने इस विद्या को समाप्त करने के पूरे प्रयास किये। इस कारण इस विद्या के असली जानकारों की संख्या कम हो गयी। यह मूल विद्या उन लोगों के पास रह गयी जो अपने पुरुखों की गद्दी को संभालते रहे। गुरुकुल को सरकारी सहायता मिलनी बंद हो गयी तो वे बंद होने लगे, इससे भारत की प्राचीन विद्या को नुकसान हुआ है।

यह पूरी दुनिया जानती है कि विश्व के प्रथम समाचार वाचक संजय सारथी थे। भगवान श्रीकृष्ण ने महाभारत युद्ध के दौरान अर्जुन को गीता के 18 अध्यायों का ज्ञान दिया था। संजय सारथी ने हस्तीनापुर के महल में बैठकर मीलों दूर हो रहे युद्ध का आंखों देखा हाल और गीता का संदेश धृतराष्ट्र व दुनिया तक पहुंचाया था, जिसको लेखबद्ध किया गया। वेदों की रचना करने वाले, द्वापर युग के महार्षि वेद व्यास जी अर्थात कृष्ण द्वैवपायन ने उस विद्या का सृजन किया था, जिससे दूर कहीं का भी हाल एक जगह पर बैठकर देखा जा सके। ताकि वहां जाने की आवश्यकता नहीं हो। इस विद्या को उन्होंने संजय सारथी को दिया।

ऐसा नहीं है कि द्वापर युग की यह विद्या समाप्त हो चुकी है। अनेकोंनेक लोगों के पास यह विद्या है और वे पीढ़ी-दर-पीढ़ी अपने पुत्र/शिष्यों को यह सिखा रहे हैं। श्रीगंगानगर में भी विद्या के जानकार उपलब्ध हैं।

यह जानकारी इसलिए दी गयी है कि भारत की महान संस्कृति ने हमें सहज जीवन जीने की कला दी है। डिप्रेशन तो अन्य देशों की सभ्यता थी, हमें तो पहला सुख निरोगी काया पढ़ाया गया था। यह ज्ञान तो हमारे पूर्वज हमें देकर गये हैं। फिर भी हम असहज हैं।

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असहज होने के प्रमुख तीन कारण हैं : बच्चों की शिक्षा का कठिन खर्च। दवाइयों का खर्चा। भोजन की व्यवस्था।

आज हर व्यक्ति का सपना है कि वह अपने बच्चों को डॉक्टर, इंजीनियर बनाये। इसलिए अभिभावक कोचिंग संस्थानों में भेजते हैं। दो सालों के कोर्स में ही 5 से 7 लाख रुपये का खर्चा कोचिंग और इसके बाद कॉलेज शिक्षा दिलाने पर जिंदगी भर की कमाई का बड़ा हिस्सा खत्म हो जाता है।

मोदी सरकार ने कक्षा प्रथम से लेकर कक्षा 12वीं तक टीवी चैनल आरंभ कर दिये हैं। इन सभी चैनल्स पर सीबीएसई की किताबों को पढ़ाया जा रहा है। हजारों करोड़ रुपये खर्च किये जा चुके हैं। यह सब हमारे लिये हुआ है।

हायर एज्युकेशन में प्रवेश के लिए भी सरकार ऑनलाइन और अन्य पाठ्यक्रम उपलब्ध करवा रही है। परीक्षा के लिए एक स्वतंत्रत परीक्षा एजेंसी का गठन कर दिया है। पहले सीबीएसई ही परीक्षा आयोजित करती थी। इस एजेंसी के अधिकारियों-कर्मचारियों का किसी भी स्कूल अथवा कोचिंग एजेंसी से सीधा संवाद नहीं है। जबकि सीबीएसई के साथ ऐसा दावा नहीं किया जा सकता।

मेडिकल कॉलेज में भी सीटें बढ़ाई जा रही हैं। नये मेडिकल कॉलेज बनाने के लिए इसी साल हजारों करोड़ रुपये के बजट का प्रावधान किया गया है। वहीं जो मेडिकल कॉलेज हैं, वहां दो पारियों में कक्षाओं का संचालन हो, ताकि 200 सीट वाले कॉलेज में क्षमता दोगुणी हो सके। इसकी संभावनाओं का आकलन किया जा रहा है और शीघ्र ही निर्णय आ सकता है। इससे एक साल में 200 नहीं बल्कि 400 डॉक्टर्स बन सकेंगे।

अभिभावकों की पहली चिंता को सरकार दूर करने की पूरी कोशिश करती हुई नजर आ रही है, जिस तरह के समाचार मिल हैं। उससे यह पता चलता है।

वहीं दवाइयों का खर्च आम आदमी को सहन नहीं कर सके, इसके लिए आयुष्मान भारत योजना आरंभ की जा चुकी है। इसके लिए पांच लाख रुपये तक का इलाज मुफ्त हो सकता है। इसमें अब कोरोना को भी शामिल किया जा रहा है।

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नवंबर तक सरकार नि:शुल्क गेहूं, चावल और दाल उपलब्ध करवाने का निर्णय कर चुकी है। भारत सरकार के पास यह भी प्रस्ताव है कि एनएफएस में अधिकाधिक लोगों को चयनित किया जा सके, ताकि हर व्यक्ति को आसानी से भोजन मिल सके। उसकी बचत ज्यादा हो सके।

ध्यान रहे कि अमेरिकी टेक कंपनियों में कार्य करने वाले ज्यादातर भारतीय हैं। हमारी पारंपरिक शिक्षा इतनी ज्यादा मजबूत है कि कंपनियों को पता है कि भारतीयों के बिना वह साफ्टवेयर को ज्यादा आसान नहीं बना सकती है। इस कारण कंपनियां भारत आ रही हैं। जिन देशों की हम नकल करते रहे हैं, वहां पर तो एक करोड़ बोलने के लिए भी 10 मिलियन जैसे शब्द का सहारा लेना पड़ता है। वे भारतीयों की बराबरी क्या करेंगे।

देश के प्रसिद्ध कोचिंग स्थलों पर एक-एक संस्थान में 50-50 हजार लोग अध्ययन करते थे और उनमें 1 हजार उत्तीर्ण हो जाते थे उसका विज्ञापन देकर अन्य लोगों को आकर्षित किया जाता था। स्कूली पढ़ाई को इतना कठिन बना दिया गया कि बच्चे तक आत्महत्या करने लगे। कोटा में तो लगभग हर दिन डराने वाली खबरें आती थीं। हर साल करीबन 12 लाख बच्चे डॉक्टर बनने के लिए परीक्षा देते हैं और मेडिकल सीट होती है करीबन 50 हजार। 50 हजार बच्चों में शामिल होने के लिए साढे 11 लाख अन्य बच्चों के भी चश्मा लग जाता था। सिरदर्द, कमजोरी, डिप्रेशन जैसे रोगों के वे शिकार हो जाते हैं। जिसका कैरियर आरंभ नहीं हुआ, वह पहले ही रोगी हो गया और हम निरोगी काया का सुख कैसे हासिल कर सकते हैं, जिसको पहला सुख ग्रंथों में भी बताया गया है।

भारत की संस्कृति पर विश्वास करें। भारत की प्राचीन सभ्यता को प्रोत्साहित करें। जयहिंद।