PM Narendra mOdi
भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, फाइल फोटो

श्रीगंगानगर। अक्सर यह कहा जाता है कि जन्म और मृत्यु ईश्वर के हाथों में है। अगर ऐसा सच होता तो सरकार अस्पतालों, चिकित्सकों और दवाइयों पर हर साल अरबों रुपया नहीं खर्च करती। मानव के स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिए विश्व वैज्ञानिकों को हजारों करोड़ रुपये रिसर्च और वेतन के रूप में नहीं देता। आईवीएफ और वेंटीलेटर की आवश्यकता नहीं रहती, किंतु प्रकृति का साथ भी अवश्य चाहिये। उसके बिना विज्ञान भी अधूरा है।

जो लोग अब तक जन्म-मृत्यु को ईश्वरीय कृपा मानते रहे हैं, उनके लिए कुछ तथ्य हैं। यह तथ्य है भी कल्याण भूमि के। कल्याण भूमि से अब तक नकारात्मक समाचार ही सामने आता रहा है किंतु लॉकडाउन के बाद वहां से भी सकारात्मक समाचार आया है। श्रीगंगानगर में अकाल मृत्यु अर्थात आक्सिमक मौत की संख्या न के बराबर हो गयी है।

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राजस्थान का श्रीगंगानगर शहर, जिसकी आबादी 3 लाख से ज्यादा है। पदमपुर मार्ग पर कल्याण भूमि है। यहां औसतन हर माह करीबन 200 शवों का संस्कार किया जाता है। इस दौरान हर आयु वर्ग के शव रोजाना आते थे।

एक मार्च को कोरोना वायरस का प्रकोप आरंभ हुआ। इसके बाद प्रतिबंधात्मक आदेश जारी होने लगे और लोग घरों में ही रहने लगे। एक मार्च से लेकर आज 15 अप्रेल तक 45 दिनों में लगभग 150 संस्कार किये गये हैं। लगभग 50 प्रतिशत  मौत की संख्या में कमी आयी है। इसी तरह के आकड़े अन्य शहरों के भी सामने आ सकते हैं।

कल्याण भूमि में उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार इस अवधि में एक बालिका जिसकी आयु 12 साल की थी और अन्य तीन अन्य व्यक्ति थे, जिनकी आयु 60 वर्ष से कम थी। इसके अतिरिक्त जिनकी मृत्यु हुई, वे आयु वर्ग में 70 से 100 वर्ष के बीच के थे। जो बालिका 12 साल की देवलोक गमन कर गयी थी, वह जन्म से ही बीमार बताई गई।

23 साल के युवक की आक्सिमक मृत्यु के अलावा युवा वर्ग की मृत्यु न के बराबर थी। रिकॉर्ड के अनुसार, इससे पिछले रिकॉर्ड में यंग डैडबॉडी भी नियमित रूप से आती थी।

यह ऐसे तथ्य हैं, जो न तो इंसान अपने स्तर पर पैदा कर सकता है न ही कम कर सकता है, किंतु इस लॉकडाउन ने यह बताया कि अगर लोग सुरक्षित रहें। बिना आवश्यक कार्य इधर-उधर नहीं जाएं। शरीर को पूरा विश्राम दें तो मृत्यु दर काफी कम हो सकती है। चिकित्सकों का भी मानना है कि अगर शरीर और मन (मस्तिष्क) को पूर्ण विश्राम मिले तो हृदय की आयु में भी बढ़ोतरी हो जाती है।

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यह भी एक तथ्य है कि अब अस्पतालों में गैर गंभीर लोगों को न तो भर्ती किया जा रहा है, न उनका ऑपरेशन किया जा रहा है। कोविड-19 से जंग के दौरान चिकित्सा सहायता आम व्यक्ति के लिए न के बराबर है, इसके बावजूद मौत के आकड़ों में भारी कमी हमें काफी बड़ी शिक्षा देती है।

कोरोना वायरस के कारण लोग अब अपने शरीर को ज्यादा स्वस्थ रख रहे हैं। सैनेटाइजर का इस्तेमाल कर रहे हैं, जो बैक्टीरिया अथवा अन्य वायरस हमारे हाथों में लग जाते थे, वे अब हमारे शरीर तक नहीं पहुंच रहे हैं। इसी कारण बच्चे, बुजुर्ग भी अब ज्यादा सुरक्षित हैं। बीमार कम हुए हैं।

इससे यह भी साफ हुआ है कि हम अब तक जो विकास मान रहे थे, वह हमारे शरीर को रौंदकर निकल रहा था। कल्याण भूमि के प्रबंधक मनीष् कुमार छाबड़ा ने जो रिकॉर्ड उपलब्ध करवाया है, उसके अनुसार लॉकडाउन के 25 मार्च से आरंभ होने के बाद तारीख वाइज जो शव कल्याण भूमि में संस्कार के लिए लाये गये, उनकी संख्या इस प्रकार है- 25 मार्च को 5, 26 को 3, 27 को 1, 28 को 1, 29 को 5, 30 को चार, 1 अप्रेल को 1, 2 अप्रेल को चार, 3 अप्रेल को 2, चार अप्रेल को 0, 5 अप्रेल को 5, 6 अप्रेल को 1, 7 अप्रेल को 2, 8 अप्रेल को 4, 9 अप्रेल को 1, 10 अप्रेल को 1, 11 अप्रेल को 1, 12 अप्रेल को 2, 13 अप्रेल को 1 और 14 अप्रेल को तीन शव लाये गये जबकि आज दोपहर तक एक ही डैडबॉडी को संस्कार हेतु कल्याण भूमि में लाया गया था।

वहीं लॉकडाउन के बाद से हरिद्वार में लोग अस्थियों का विसर्जन नहीं करने जा पा रहे हैं इस कारण लॉकर में अस्थियां रखने के लिए जगह न हीं है। अस्थियों को सुरक्षित रखने के लिए वैकल्पिक व्यवस्था भी की गयी है।

लॉकडाउन के बाद आईएमएफ का कहना है कि अनेक देशों में विकास दर ऋणात्मक हो जायेगी। यह भय करने वाले आकड़े हैं। विश्व भर में गरीब लोगों की संख्या में भारी इजाफा हो जाने का अनुमान है। लेकिन लॉकडाउन के कारण प्रकृति को जीवित होने का मौका मिला है। ऐसे वीडियो हमारे सामने आ रहे हैं जिससे हम पक्षियों की दिल खुश करने वाली आवाज सुन रहे हैं और वन्य जीवों को शहरी क्षेत्रों में विचरते हुए देखते हैं बिना भय के। उन्हें अब दो पैरों वाले जीव का भय नहीं है। इससे मनुष्य का तन और मन ज्यादा स्वस्थ हुआ है, यह विज्ञान भी मान रहा है। यह प्रकृति भी कह रही है। यह मृत्यु दर में आई 50 प्रतिशत की गिरावट भी बता रही है। 45 दिनों के भीतर जिला मुख्यालय पर ही कम से कम 150 लोगों के जीवन को लम्बी आयु दे दी।

परहित के लिए सदैव सजग रहने वाले विनोद सेठी का भी मानना है कि लोगों का स्वास्थ्य को सुरक्षित करने के प्रति रुझान बढ़ा है। उनका यह भी मानना है कि जंक फूड और बाहर का खाना खाने की आदत से लोग मुक्त हुए हैं तो यह भी उनकी सेहत के लिए बहुत लाभकारी रहा है।