मोत का मामला
हनुमानगढ़ जिले में आत्महत्या

रोजाना नहरों से आते हैं शव, नहीं हो पाती पहचान

दशकों से रोजाना हो रहा है लाशों का निर्यात

धरने के बाद भी पंजाब सरकार अभी भी स्वप्न में

श्रीगंगानगर/हनुमानगढ़, 14 अगस्त। 10 हजार से अधिक लोग ऐसे हैं, जो अपनी मौत के बाद भी खामोश नहीं हैं। उनकी लाशें भले ही श्रीगंगानगर और हनुमानगढ़-बीकानेर जिले में दफन हों, लेकिन उनकी आत्मा आज भी यह पुकार रही हैं कि मरने के बाद भी क्या न्याय मिल सकता है? क्या हमारे परिवारवालों को कोई जाकर बता सकता है कि हम इस दुनिया में नहीं रहे, हमारा इंतजार नहीं किया जाये।


 भारत में मानव का क्या मूल्य है? अगर इसका कोई नजदीक से परीक्षण करना चाहे तो वह भारत-पाक सीमा पर बसे श्रीगंगानगर जिले में आकर देख सकता है। यहां हर रोज नहर में एक लाश आती है। इस लाश को पुलिस निकालती है और पोस्टमार्टम की आधी-अधूरी प्रक्रिया को करवाकर लाश को दफन कर दिया जाता है। इस इंतजार में कि हो सकता है कभी इनका परिवारवाला उनकी तलाश करता हुआ आ जाये तो उसका डीएनए करवाया जा सके। बरसों बाद आज भी वो इंतजार जारी है।

श्रीगंगानगर जिले की पाक सीमा से दूरी तो मात्र 20 किमी है किंतु प्रदेश की राजधानी जयपुर से यह 500 किमी, देश की राजधानी दिल्ली से 420 किमी और राजस्थान हाइकोर्ट से 550 किमी की दूरी पर है। इससे पहले तो कोई सुनवाई होती नहीं। इतनी दूरी तक अपनी बात पहुंचाने के लिए 10 से 15 हजार रुपये तक की मोटी रकम खर्च हो जाती है और फिर भी यह प्रमाणित नहीं किया जा सकता कि वहां भी बात को सुन लिया जायेगा।


पाकिस्तान से सटे इस जिले में प्राइवेट या पब्लिक सैक्टर में कोई भी बड़ा उद्यम नहीं है। यहां के अधिकांश लोग अब सट्‌टा को अपना व्यवसाय मान चुके हैं। उसी में बिजी रहते हैं। 15 साल से लेकर सीनियर सिटीजन सट्‌टा तक की अवैध दुकानों पर नजर आते हैं। कानून व्यवस्था की नोडल एजेंसी, राजस्थान पुलिस का भी प्रयास होता है कि यह व्यवसाय ज्यादा से ज्यादा “फले-फूले” ताकि यहां के लोगों को “रोजगार” तो मिलता रहे।

श्रीगंगानगर जिले को सिंचाई सुविधा देने के लिए पंजाब की नदियों से नहर निकालकर लाई जाती है। दो प्रमुख परियोजनाएं हैं बीकानेर कैनाल और इंदिरा गांधी कैनाल। इन दोनों ही नहरों में रोजाना ही एक या दो शव आते हैं। पंजाब से चलते हुए यह शव श्रीगंगानगर-हनुमानगढ़ अथवा बीकानेर जिले तक पहुंचते हैं तो मात्र कंकाल के रूप में रह जाते हैं।


यह सिलसिला एक-दो साल से नहीं बल्कि दो दशक से भी अधिक समय से चल रहा है। रोजाना नहर से शव आते हैं। राजस्थान पुलिस का एक हवलदार स्तर का कर्मचारी कुछ ग्रामीणों को साथ लेकर नहर पर पहुंचता है और शव को बाहर निकालता है। उसके पोस्टमार्टम की आधी-अधूरी प्रक्रिया को पूरी किया जाता है और लाश को दफन कर दिया जाता है। यह जानते हुए भी मृतक हिन्दू है और उसका अन्तिम संस्कार किया जाना चाहिये, किंतु कोई भी पुलिस कर्मचारी उसके हिन्दू रिति रिवाज के अनुसार प्रक्रिया तक पूरी नहीं करवाता।

लाश कहां से आई? मृतक कौन था? मृतक नहर में कैसे गिरा? उसको किसने मारकर फेंका? इस जैसे न जाने कितने सवाल होते हैं जो जवाब मांगते हैं किंतु व्यस्त पुलिस के पास इन सवालों का जवाब खोजने के लिए समय नहीं होता और दूसरे दिन ही उनको फिर से उसी प्रकार की लाश का सामना करना पड़ता है। फिर से वही प्रक्रिया अपनाई जाती है। दो दशक से यही सबकुछ हो रहा है।

लाशें कहां से आती हैं और इनके परिजन इनको क्याें नहीं तलाश पाते? इस तरह के सवाल तलाशने के लिए भारतीय पुलिस सेवा के एक वरिष्ठ अधिकारी से सम्पर्क किया गया। यह अधिकारी नहरी क्षेत्र में पुलिस अधीक्षक रह चुके हैं।

बकौल आईपीएस, नहर में आने वाले अधिकांश् लाशें बिहार-झारखण्ड राज्यों के लोगों की होती हैं। इनको मानव तस्करी के माध्यम से पंजाब तक लाया जाता है। इन गरीब लोगों को झांसा दिया जाता है कि पंजाब में उनको अच्छी पैगार मिलेगी। इस तरह से पंजाब में लाकर उनको बंधुआ मजदूरी का कार्य करवाया जाता है। ऐसे ही लोगों को हत्या करने के उपरांत नहर में फेंक दिया जाता है। उन्होंने स्वीकार किया कि पुलिस को जिस तरह से जांच करनी चाहिये, वे नहीं कर पाती।


राजस्थान कैडर के इस आईपीएस की बातों से साफ हो गया है कि पंजाब में मानव तस्करी का धंधा खूब चल रहा है। वहां पर इंसानों को भेड़-बकरी की तरह खरीदा-बेचा जाता है। इसके बाद उनकी हत्या करना भी उनके लिए आसान कार्य हो जाता है।

“सांध्यदीप” ने एक किसान को भी तलाश लिया, जिसके हाथ कभी इस तरह के हालात का एक खेत मजदूर लगा था। श्रीकरणपुर तहसील के एक जटसिख किसान ने बताया कि वह पंजाब में ननिहाल गया हुआ था, तो उसको वहां एक व्यक्ति मिला था। उसने उसको एक खेत मजदूर दिया था और बदले में उससे एडवांस में पैसे ले लिये। कुछ दिनों में उसको ज्ञात हो गया कि यह मानव तस्करी का शिकार हुआ व्यक्ति है तो उसने उसकी मदद करने का फैसला किया।


ढिल्लो परिवार के इस किसान ने यह भी बताया कि इस मजदूर को सिर्फ अपने गांव और तहसील का ही मालूम था। वह तहसील झारखण्ड में है अथवा बिहार में, यह भी उसको पता नहीं था। बकौल मिस्टर ढिल्लो, उसने रेलवे स्टेशन पर जाकर तहसील का नाम पता किया तो मालूम हुआ कि वहां रेलवे स्टेशन भी है और वह इलाका झारखण्ड के आदिवासी इलाकों में आता है, जहां इंसान की कीमत पैसों में लगायी जाती है। किसान के अनुसार उसने खेत मजदूर को 5-7 हजार रुपये दिये और उसके लिए ही नहीं बल्कि अपने लिये भी टिकट बुक करवायी। वह उसको लेकर झारखण्ड में उसके तहसील मुख्यालय तक पहुंचा। वहां से उसने बताया कि वह अब अपने गांव जा सकता है। इसके बाद वह वहां से वापिस आया। उसने कहा कि उसको आज खुद पर फख्र है कि उसने एक बंधुआ मजदूर को अनजाने में ही मुक्त करवाया और फिर उसको घर तक छोड़कर भी आया। वह इसे वाहेगुरु की कृपा मानता है कि परिवार से पिछड़ा हुआ व्यक्ति फिर से अपने मां-बाप और परिवार के अन्य सदस्यों के पास चला गया।

किंतु सच यह है कि हर कोई व्यक्ति उस तरह का खुशनसीब नहीं होता जो बंधुआ मजदूरी से आजाद हो सके। लगभग 10 हजार से अधिक शव भले ही जमीन में दफन हों, किंतु वह पुकार रहे हैं कि कोई उनकी आवाज को सुनें और घर तक आवाज पहुंचा दे, अब वे वापिस नहीं आ सकते। अब वे वहां चले गये हैं, जहां से कोई वापिस नहीं आ पाया है।


हम भले ही उन 10 हजार लोगों को नहीं बचा पाये हैं लेकिन कोई और व्यक्ति किसी व्यक्ति का शिकार नहीं हो जाये और उसकी लाश हमें सड़ी-गली हालत में एक नहर से मिले।

गत 12 सितंबर 2018 को पत्रकार सतीश बेरी ने मानवीय मूल्यों को ध्यान में रखकर यह मुद्दा पंजाब सरकार तक पहुंचाने के लिए पंजाब सरकार के सचिवालय के बाहर धरना भी लगाया था। सरकार ने आश्वासन भी दिया था किंतु आज एक साल गुजर जाने के बावजूद कोई कार्यवाही नहीं होना दर्शाता है कि पंजाब सरकार इस मानवाधिकार उल्लंघन के गंभीर मामले में भी कितनी लापरवाह है।

गालिब के एक शे’र के साथ इस खबर को समाप्त करता हूं

बस-कि दुश्वार है हर काम का आसाँ होना, आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसाँ होना। 


राजस्थान पुलिस की अवैध प्रताड़ना से दुखी महिला ने की आत्महत्या

राजस्थान के भरतपुर जिले से एक बार फिर दिल-दहला देने वाली खबर आयी है। पुलिस की अवैध हिरासत में हुई प्रताड़ना से दु:खी होकर एक महिला ने आत्महत्या कर ली। मंगलवार शाम तक भारतीय मानवाधिकार आयोग की कोई प्रतिक्रिया नहीं आयी थी और इससे उसकी कार्यप्रणाली एक बार फिर से सवालों के घेरे में खड़ी हो गयी है।

श्रीगंगानगर की 7 अगस्त 2019 की टॉप 5 न्यूज

राजस्थान के ही चुरू जिले में कुछ ही दिन पूर्व एक महिला ने पूरे देश में यह बयान देकर सनसनी फैला दी थी कि उसको थाने की अवैध हिरासत में रखकर प्रताड़ना दी गयी। उसके देवर की पुलिस की कथित पिटाई के बाद पुलिस हिरासत में ही मौत हो गयी। उसको पुलिस ने चोरी जैसे साधारण प्रकरण में गिरफ्तार कर कई दिन तक अवैध हिरासत में रखा। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने एसपी को एपीओ करते हुए डीप्टी एसपी को निलम्बित कर दिया था। जबकि डिप्टी एसपी सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी की एक महिला नेता का नजदीकी रिश्तेदार भी बताया जाता था। इसके बावजूद श्री गहलोत ने इस प्रभावशाली पुलिस अधिकारी को निलम्बित करने में देर नहीं लगायी।

वहीं आज भरतपुर से डरावनी खबर आयी है। यह खबर एक बार फिर से राजस्थान पुलिस को कटघरे में खड़ा करती है।

पाक सेना ने कश्मीर पर सरकार का किया समर्थन

समाचार एजेंसी यूनिवार्ता ने समाचार दिया है कि सेवर थाना क्षेत्र के गांव बाबाजी का नगला निवासी अमिता देवी को थाने की पुलिस उसके पति राम जाटव के खिलाफ गत 24 जुलाई को अपनी एक पड़ोसी लड़की को भगा कर ले जाने के मामले में पूछताछ के लिए थाने लाई, जहां कथित तौर पर उसके साथ मारपीट की गई। पुलिस ने छोड़ते समय महिला को चेतावनी दी कि अगले चौबीस घण्टों में उसने अपने पति की लोकेशन के बारे में जानकारी नहीं दी तो उसे वापस थाने लाकर टार्चर किया जाएगा। मृतक महिला के परिजनों के अनुसार आत्महत्या करने से कुछ घण्टों पूर्व महिला ने अपनी छोटी बहन सविता देवी को उसके साथ हुए बर्ताब की जानकारी देने के बाद अपने कमरे की कुंडी लगा ली और फांसी के फंदे पर झूल गयी।

इस घटना के बाद भरतपुर पुलिस पर सवाल भी उठे और लोगों ने शव के साथ धरना भी लगा दिया। पुलिस के उच्च अधिकारी बाद में मौके पर पहुंचे और समझाइश की जिसके बाद शव का अन्तिम संस्कार किया गया।

हैरानीजनक बात यह है कि पुलिस की अवैध हिरासत में प्रताड़ना से दुखी होकर महिला के आत्महत्या करने के उपरांत भी भारतीय मानवाधिकार आयोग अथवा राजस्थान के मानवाधिकार आयोग का एक बयान तक नहीं आया है। इससे साबित होता है कि भारत में मानवाधिकार आयोग आज भी सरकारों की कठपुतली बना हुआ है और विश्व को भ्रमित करने तथा अपने नजदीकी न्यायाधीशों को लाभान्वित करने के लिए आयोग बनाये हुए हैं।

ध्यान रहे कि सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड न्यायाधीश को मानवाधिकार आयोग का अध्यक्ष बनाया जाता है। इसको अर्द्धन्यायिक अदालत की शक्तियां प्राप्त हैं।

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