किसान आत्महत्या
हनुमानगढ़ में आत्महत्या के मामले।

सतीश बेरी
श्रीगंगानगर। स्थान : पुरानी आबादी में कृष्णा मंदिर के नजदीक संजय वाटिका। समय : बुधवार दोपहर 2.30 बजे। स्कूल बस की टक्कर से एक वृद्ध सडक़ पर बेसुध पड़ा था। उसके शरीर के अनेक हिस्सों पर चोट के निशान थे और खून निकल रहा था। बस के निकट ही बाइक गिरी हुई थी और एक अन्य व्यक्ति सिर से निकल रहे खून को रोकने का असफल प्रयास कर रहा था। आसपास तमाशबीनों की भीड़ लगी हुई थी। हर कोई एक-दूसरे को सलाह दे रहा था कि क्या करना चाहिये किंतु कर भी नहीं रहा था। इसी दौरान दैनिक सांध्य फाइटर कार्यालय में कार्य सम्पन्न करने के बाद मैं अपने घर पर जा रहा था। संयोग से आज कृष्णा मंदिर से संजय वाटिका वाली रोड की तरफ हो गया और वहां बुजुर्ग और एक अन्य व्यक्ति को घायल हालत में देखा। पास ही एक निजी स्कूल की बस खड़ी हुई थी जिसके सामने क्षतिग्रस्त हो चुका बाइक नजर आ रहा था। भीड़ ने चारों तरफ घेराबंदी की हुई थी। हालात को समझने में देर नहीं लगी कि बस की टक्कर से बुजुर्ग घायल हो गया है। भीड़ वहां अपनी सलाह देने का कार्य जारी रखे हुए थे। सभी एक-दूसरे पर बात डाल रहे थे।

ऐसे हालात में मुझे पत्रकारिता के लिए फोटो खींचने के स्थान पर उस वृद्ध को अस्पताल पहुंचाना जरूरी लगा क्योंकि वे बेहोश थे। उनकी हालत बता रही थी कि उनको असहनीय पीड़ा हो रही है। इस दौरान मेरे कहने पर युवक ने वृद्ध को मेरी बाइक पर बैठाया। मेरे आग्रह पर युवक बाइक के पीछे बुजुर्ग को संभालकर बैठ गया।

उसको लेकर मैं एम्बुलैंस की तरह बाइक को चलाता हुआ 8 या 9 मिनिट्स में अस्पताल पहुंच गया। मुझे हालात यह अहसास दिला रहे थे कि 108 एम्बुलैंस का इंतजार किया जाना उचित नहीं होगा। बुजुर्ग के शरीर से निकल रहा रक्त मेरी टी शर्ट को अपने रंग में रंग रहा था। पैंट और शर्ट खून से सन चुके थे और अस्पताल पहुंचा तो वहां एक संवेदनशील महिला चिकित्सक बैठीं थीं। उनको मैंने अपना परिचय दिया तो इस महिला डॉक्टर ने तुरंत घायल का बीपी चैक किया। बीपी 180 था। तुरंत दर्द और बीपी कंट्रोल के लिए दवा दी।

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इस दौरान बुजुर्ग की जेब में मौजूद मोबाइल बज उठा। उसको उठाया तो सामने से आयी आवाज में बताया गया कि वृद्ध का नाम भगवानदास राजपाल है। वे कृष्णा मंदिर के नजदीक ही रहने वाले सुभाष राजपाल के पिता हैं। फोन करने वाला उनका पौत्र था जिसको इमरजेंसी वार्ड की जानकारी दी गयी तो कुछ देर बाद वह वहां पहुंच गया। फोन करने वाला 15-16 साल का किशोर था। उसने बताया कि घायल हुआ दूसरा व्यक्ति उनका चाचा था जिसका इलाज एक निजी चिकित्सक से करवाया जा रहा है। डॉक्टर ने दर्द निवारक इंजेक्शन लगाये तो इससे वृद्ध को काफी राहत मिली और कुछ समय बाद वे स्वयं को संभाल पाने की स्थिति में दिखाई देने लगे। डॉक्टरों ने एहतियातन उनका सिटी स्कैन करवाने का निर्णय लिया ताकि सिर में कोई चोट नहीं लगी हो। वहीं कुछ मिनिट्स बाद ही अरोड़वंश ट्रस्ट के पूर्व प्रधान जोगिन्द्र बजाज वहां पहुंच गये। उनको किसी ने भगवानदास राजपाल के दुर्घटना में घायल होने की जानकारी दी थी। श्री बजाज भी उनके स्वास्थ्य को लेकर काफी चिंतित दिखाई दे रहे थे।

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श्री राजपाल को मेल मेडिकल वार्ड में एडमिट कर लिया गया था। उनके परिवार के बाकी सदस्यों का पहुंचना आरंभ हुआ तो मैं वहां से विदा हुआ।

इस घटना की जानकारी देने का उद्देश्य यह कदापि नहीं लगाया जाये कि मैंने महान कार्य किया है। इसका अर्थ सिर्फ यही है कि भारी भीड़ होने के बावजूद वहां इंसान तडफ़ रहा था और लोग अपनी संवेदनशीलता को खोकर सिर्फ वहां तमाशबीन बने हुए थे। अगर वे तुरंत ही दुर्घटना करने वाली निजी स्कूल की बस में ही उनको ले जाते। किसी ने 108 एम्बुलैंस तक को सूचना नहीं दी। दर्जनों लोग एक-दूसरे को सलाह ही दे रहे थे।

वहीं पत्रकार के रूप में भी मेरा यह फर्ज था कि घायल को प्राथमिक इलाज मिले। न कि मेरा वहां खड़े होकर घटनास्थल की फोटो और वीडियो बनाने का। जैसा कि आजकल बड़ी संख्या में होता है। मैं तो वहां दुर्घटनाकारित करने वाली बस की तरफ भी गौर से ध्यान नहीं दे पाया कि वह किस विद्यालय की बस है।

शहर में बहुत कुछ ऐसा होता है जब हम अपना व अपने ही लोगों का नुकसान होता देखते हैं और चुप हो जाते हैं। ऐसा ही मीरा मार्ग का हाल है, जहां ठेकेदार ने मनमर्जी से इंटरलोकिंग की है। इस मार्ग पर हजारों लोग वहां से गुजरते हैं किंतु आज तक किसी ने ठेकेदार की इस हठधर्मिता के बारे में कुछ नहीं लिखा अथवा बोला। इस मार्ग पर रोजाना ही पूरे दिन धूल उड़ती है किंतु आज तक नगर परिषद में कोई शिकायत करने नहीं पहुंचा।

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इसकी शिकायत भी मैंने व्यक्तिगत रूप से नगर परिषद की निर्माण शाखा प्रभारी अधिशाषी अभियंता सुखपाल कौर से की। भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक को भी अवगत करवाया। इस कार्यवाही के बाद आज नहीं तो कल ठेकेदार को नियमानुसार कार्य करना ही होगा। तभी उसका भुगतान हो पायेगा। अगर नगर परिषद भुगतान कर देती है तो इस मिलीभगत में सीधे शामिल होने का प्रमाण हासिल कर लेंगे।

मेरे का कोई चुनाव नहीं लडऩा है। न ही कोई शहर का नेता बनना है। मैं पत्रकार के रूप में ही बाबा गुरुनानक के बताये हुए रास्ते पर चलकर नर सेवा नारायण सेवा की तरह कार्य करना चाहता हूं। बात उन लोगों की है जो सबकुछ देखकर चुप हो जाते हैं। दूसरों की मदद को अगर हम आगे नहीं बढ़ेेंगे तो कभी हमारे साथ कोई घटना होती है तो दूसरा भी कैसे आगे बढ़ेगा।

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