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मालगाड़ी से कट कर 16 मजदूरों की मौत, मृतकों के वारिसों को पांच-पांच लाख का मुआवजा

श्रीगंगानगर। राजस्थान का श्रीगंगानगर जिला। देश की राजधानी दिल्ली के पश्चिम दिशा में लगभग 450 किमी दूर है और प्रदेश की राजधानी जयपुर से 500 किलोमीटर दूर है। औसतन एक व्यक्ति रोजाना यहां आत्महत्या कर रहा है और आत्महत्या के कारण मानसिक तनाव बताये जा रहे हैं।

पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय सीमा और पंजाब के साथ अंतरराज्यीय सीमा को यह जिला सांझा करता है।

देश और प्रदेश की राजधानी से सैकड़ों किमी की दूरी होने के कारण यहां बहुत कुछ ऐसा होता है, जिसका सरकार में बैठे जिम्मेदार लोगों का मूक समर्थन होता है।

भ्रष्टाचार ने यहां इस रूप में जन्म लिया कि मानवाधिकार कब समाप्त हो गए, किसी को पता नहीं चला। पुलिस तंत्र में फैला भ्रष्टाचार इस कदर हावी है कि पुलिस को एक गुंडा टीम बनाया हुआ है।

अगर हम एक पुलिस कर्मचारी की बात पर यकीन करें तो पिछले दिनों एक साथ 200 से ज्यादा पुलिस कर्मचारियों के तबादले हुए। इसमें 10 हजार से लेकर 2 लाख रुपये तक की रिश्वत प्रत्येक पुलिस कर्मचारी से ली गयी।

श्रीगंगानगर के ग्रामीण अंचल में ही नहीं बल्कि जिला मुख्यालय पर, जहां कलक्टर-एसपी स्तर के अधिकारी नियुक्त है, वहां युवा वर्ग को आसानी से स्मैक, हेरोइन, पोस्त, अफीम और दवाइयों का नशा आसानी से उपलब्ध होता है। इन नशे की चपेट में आये युवाओं की आयु सीमित होती है। नशे की पूर्ति के लिए युवा लोगों के घरों में घुसकर चोरी और महिलाओं के साथ पर्स व चैन लूटने जैसी वारदात सरेआम करते हैं।

वहीं सबसे दुर्भाग्यशाली बात यह भी है कि औसतन हर रोज एक गरीब/दलित व्यक्ति आत्महत्या कर लेता है। पुलिस विभाग के आकड़ों पर अगर कोई भी मानवाधिकार एजेंसी नजर डाले तो डरा देने वाली सच्चाई सामने आती है कि किस तरह से मनुष्य की मौत का आकलन भी एक पशु की तरह किया जाता है।

पुलिस विभाग के आकड़ों पर नजर डालें तो अक्सर पुलिस अधिकारी जो रिपोर्ट खुदकुशी करने वाले व्यक्ति के रिश्तेदार से लिखवाते हैं, उसमें आत्महत्या का कारण मानसिक तनाव बता दिया जाता है।

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अक्सर रिपोर्ट में यह लिखवाया जाता है कि मरने वाला व्यक्ति मानसिक रूप से बीमार था। इस कारण उसने आत्महत्या कर ली। अगर पुलिस विभाग के आकड़े सही हैं तो प्रशासन और राज्य सरकार/केन्द्र सरकार ने आज तक लोगों को डिप्रेशन से मुक्त करने के लिए कोई अभियान क्यों नहीं चलाया।

अगर पुलिस विभाग के आकड़ें झूठे हैं तो फर्जी जांच रिपोर्ट तैयार करने वाले पुलिस अधिकारियों पर कार्यवाही क्यों नहीं हुई?

हर वर्ष 350 से ज्यादा व्यक्तियों की मौत सिर्फ खुदकुशी करने के कारण हो रही है। यह औसतन आकड़ा है, जबकि पुलिस कभी आत्महत्या करने वालों की रिपोर्ट जारी नहीं करती है।

हैरानीजनक बात यह भी है कि इस जिले में मानसिक रोग इतने गंभीर स्तर पर पहुंच चुका है और आज तक कलक्टर अथवा पुलिस की ओर से कोई भी रिपोर्ट सरकार तक नहीं पहुंचायी गयी है।

वहीं एक पुलिस अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया है कि दूर-दराज के क्षेत्र में अक्सर हत्या की वारदात को भी आत्महत्या का रूप दे दिया जाता है।

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