राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प
अमेरिका के राष्ट्रपति श्री डोनाल्ड ट्रम्प चुनावी रैली को संबोधित करते।

वाशिंगटन। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ओक्लाहोमा प्रांत के तुलसा शहर में एक विशाल जनसभा को संबोधित किया। समर्थकों का भारी उत्साह दिखाई दे रहा था।

कोरोना वायरस प्रकोप के बाद यह उनकी पहली चुनावी जनसभा थी और उन्होंने इस सभा में हिंसक प्रदर्शन करने वालों को चेताया और साथ ही कहा कि रिपब्लिकन पार्टी कभी भी नस्ल, धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं करती। उन्होंने कहा कि पार्टी सभी के लिए न्याय का समर्थन करती है।

वामपंथी संगठन एंटीफा ने इस रैली में भी समर्थकों को प्रवेश से रोकने की कोशिश की किंतु उनका यह प्रयास ज्यादा सफल नहीं हुआ।

तुलसा शहर में चुनावी सभा में उन्होंने देश के अराजकतत्वों को भी कड़ा संदेश दिया और कहा कि हिंसा इस देश की पहचान नहीं है। अराजकत्वों के खिलाफ कड़ी कार्यवाही की आवश्यकता है।

उन्होंने अमेरिका के साथ-साथ दुनिया भर को विश्वास दिलाया कि अमेरिका कभी भी नस्ल, धर्म, जाति के आधार पर भेदभाव नहीं करता। सभी को बराबर न्याय मिले, यह उनकी और रिपब्लिकन पार्टी की भी प्राथमिकता है।

अमेरिका में बंटवारे की राजनीति करने वालों को भी उन्होंने नहीं बख्शा और कहा कि अमेरिका के शांत मतदाता सबकुछ देख रहे हैं और आने वाले चुनावों में वे जोई बाइडेन को हराने के लिए तैयार हैं। ट्रम्प ने कहा, “बाइडेन पांच महीने बाद नवंबर में हारने वाले हैं।”

बंटवारे की राजनीति करने वालों को दिया झटका

एंटीफा, जिसको चीन का भी समर्थन था, अमेरिका को बांटने की कोशिश थी। अफ्रीकन-अमेरिकी लोगों को यह भय दिखाया गया कि ट्रम्प के शासनकाल में उनकी सम्पत्ति, उनका कैरियर और जीवन सुरक्षित नहीं है।

जिस तरह से प्रदर्शन को हिंसक बनाया गया और डेमोक्रेटिक पार्टी के शासन वाले राज्यों में पुलिस भी राजनीतिक दबाव में मूक दर्शक बनी रही। उससे अमेरिका के श्वेत लोग भी भयभीत हो गये थे। इस तरह के माहौल में डोनाल्ड ट्रम्प ने अपना राजनीतिक कौशल का प्रदर्शन किया और लोगों को विश्वास दिलाया कि रंग, नस्ल और धर्म के आधार पर किसी के साथ भेदभाव नहीं होगा। चीन की साजिश नाकाम हो गयी।

चीन चाहता था कि हिंसक प्रदर्शन के कारण डोनाल्ड ट्रम्प उसमें फंस कर रह जाएं। अपना चुनाव प्रचार नहीं कर पाएं, लेकिन ट्रम्प ने चीन की मंशा को भांप लिया था।

चार साल से चल रही थी साजिश

अमेरिकी चुनावों को प्रभावित करने के लिए चीन पिछले चार सालों से साजिश रच रहा था। अमेरिका में श्वेतों के बाद सबसे बड़ी संख्या अफ्रीकन देशों के लोगों की है, जो बेहतर रोजगार की तलाश में अमेरिका पहुंचे और वहीं बस गये।

डेमोक्रेटिक पार्टी के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अप्रवासी लोगों को अमेरिका में आने के लिए पिछले दरवाजे से प्रवेश के लिए नीतियां बनाईं ताकि अप्रवासी लोगों की समस्या से अमेरिका का अगला प्रशासन परेशान रहे। अमेरिका में शांति नहीं रह सके।

वहीं चीन ने अफ्रीकी देशों को अपने कर्ज के तले दबाना शुरू कर दिया। अफ्रीकन देशों पर चीन का सर्वाधिक कर्जा है। वहां पर वामपंथी संगठनों ने अपनी पकड़ मजबूत बना ली है।

हालांकि वहां की स्वास्थ्य सेवाएं कमजोर है और चीन ने उसकी मदद कभी भी मदद नहीं की और वह अमेरिका में अपने प्रभाव बढ़ाने के लिए अपनी धनशक्ति का इस्तेमाल करता रहा। अमेरिका में चुनावी साल में जो हिंसक प्रदर्शन हुए। वामपंथी संगठन एंटीफा, उसका नेतृत्व कर रहा था, उससे प्रमाणित होता है कि चीन कितनी बडी साजिश रच रहा था।

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मीडिया ने भी किया जमकर दुरुपयोग

वामपंथी संगठन ही नहीं ब्लकि कुछ मीडिया हाउस भी चाहते हैं कि डोनाल्ड ट्रम्प दुबारा व्हाइट हाउस नहीं पहुंच पायें। इसी के चलते उन्होंने ट्रम्प की छवि को प्रभावित करने के लिए भी आकड़ों का भी खेल खेला।

मीडिया हाउस ने कहा कि पुलिस हिंसा में मरने वालों ने लिखा, काले लोग अमरीका की कुल आबादी का मात्र 13 फिसदी हिस्सा हैं लेकिन पुलिस की गोली से मरने वालों की संख्या देखा जाए तो कुल मौतों का एक चौथाई हिस्सा काले लोगों का है। उनके कहने का अर्थ यही था कि अगर 100 मरते हैं तो 25 काले लोग हैं। यह क्यों नहीं लिखा गया कि 75 श्वेत अथवा अन्य भी हैं। अगर डेमोक्रेटिक पार्टी के राज के क्राइम के ग्राफ को देखा जाये तो भी यह साफ होता है कि लूटपाट और चोरी आदि के अपराध में अश्वेत लोगों की संख्या, अन्य रंग के अपराधियों के मुकाबले अधिक है।

डेमोक्रेट्स रहे चीन पर फिदा

वर्ष 2008 से वर्ष 2016 तक अमेरिका पर डेमोक्रेटिक नेता बराक ओबामा का राज रहा। 8 सालों में वे किस कदर अमेरिका पर मेहरबान हुए, इसके भी प्रमाण आर्थिक रूप से सामने आ चुके हैं। उनको अमेरिकी नागरिकता देने में भी वे काफी उदारवादी रहे।

जो जानकारी मिली है, उसके अनुसार अमेरिका में चीनी नागरिकों की आबादी वर्ष 2000 में 11 लाख 92 हजार थी। वर्ष 2018 में यह आबादी 24 लाख 55 हजार हो गयी। अगर 2010 के आकड़ों पर नजर डालें, जो जरूरी भी है, वर्ष 2010 में चीनी आबादी 18 लाख 8 हजार थी। ट्रम्प के कार्यकाल में वर्ष 2017 में वित्त वर्ष 2017 में चीनी मूल के 37,674 लोगों को अमेरिकी नागरिकता मिली। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि वहां पर किस तरह से चीनी का वर्चस्व बढ़ा।

संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या विभाग द्वारा 2019 के अनुमान के अनुसार, संयुक्त राज्य अमेरिका, चीनी प्रवासियों के लिए शीर्ष गंतव्य है, चीन के बाहर रहने वाले 12 मिलियन से अधिक चीनी के लगभग 27 प्रतिशत अमेरिका में ही रहते हैं। अन्य लोकप्रिय स्थलों में कनाडा (920,000), जापान (785,000), ऑस्ट्रेलिया (750,000), दक्षिण कोरिया (620,000) और सिंगापुर (451,000) शामिल हैं।

ट्रम्प ने अब्राहिम लिंकन को किया याद किया

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने तुलसा में आयोजित रैली में कहा कि वे अमेरिका को पूर्व राष्ट्रपति अब्राहिम लिंकन को अपना आदर्श मानते हैं और उनकी नीतियों के अनुसार ही प्रत्येक वर्ग को बराबरी का मौका देना चाहते हैं। किसी के साथ रंग, जाति, धर्म अथवा नस्ल के आधार पर भेदभाव नहीं होने दिया जायेगा। कानून-व्यवस्था बनाये रखना उनकी प्राथमिकता है।

उल्लेखनीय है कि श्री लिंकन को अमेरिका में दास प्रथा समाप्त करने के लिए जाना जाता है। वे प्रथम रिपब्लिकन थे जो अमेरिका के राष्ट्रपति बने। अब्राहम लिंकन को वकालत से कमाई की दृष्टि से देखें तो अमेरिका के राष्ट्रपति बनने से पहले अब्राहम लिंकन ने बीस साल तक वकालत की। लेकिन उनकी वकालत से उन्हें और उनके मुवक्किलों को जितना संतोष और मानसिक शांति मिली वह धन-दौलत बनाने के आगे कुछ भी नहीं है। उनके वकालत के दिनों के सैंकड़ों सच्चे किस्से उनकी ईमानदारी और सज्जनता की गवाही देते हैं।

रिपब्लिकन नेता लिंकन का महान व्यक्तित्व
रिपब्लिकन अब्राहिम लिंकन अधिवक्ता थे। अपने उन मुवक्किलों से अधिक फीस नहीं लेते थे जो ‘उनकी ही तरह गरीब’ थे।

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एक बार उनके एक मुवक्किल ने उन्हें पच्चीस डॉलर भेजे तो लिंकन ने उसमें से दस डॉलर यह कहकर लौटा दिए कि पंद्रह डॉलर पर्याप्त थे। आमतौर पर वे अपने मुवक्किलों को अदालत के बाहर ही राजीनामा करके मामला निपटा लेने की सलाह देते थे ताकि दोनों पक्षों का धन मुकदमेबाजी में बर्बाद न हो जाये इसके बदलें में उन्हें न के बराबर ही फीस मिलती थी। एक शहीद सैनिक की विधवा को उसकी पेंशन के 400 डॉलर दिलाने के लिए एक पेंशन एजेंट 200 डॉलर फीस में मांग रहा था। लिंकन ने उस महिला के लिए न केवल मुफ्त में वकालत की बल्कि उसके होटल में रहने का खर्चा और घर वापसी की टिकट का इंतजाम भी किया।

लिंकन कभी भी धर्म के बारे में चर्चा नहीं करते थे और किसी चर्च से सम्बद्ध नहीं थे। एक बार उनके किसी मित्र ने उनसे उनके धार्मिक विचार के बारे में पूछा. लिंकन ने कहा – “बहुत पहले मैं इंडियाना में एक बूढ़े आदमी से मिला जो यह कहता था ‘जब मैं कुछ अच्छा करता हूँ तो अच्छा अनुभव करता हूँ और जब बुरा करता हूँ तो बुरा अनुभव करता हूँ। यही मेरा धर्म है’