अमेरिका के प्रमुख समाचार
राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी

नई दिल्ली। भारत और चीन के बीच चल रहे सीमा तनाव को लेकर इन दिनों राजनीति गर्मायी हुई है। जिन लोगों ने न तो पिछले 70 सालों में गलवान घाटी को देखा और न ही 15-16 जून 2020 की रात के बाद देखा है। वे भी सुपर स्पैशलिस्ट बनकर अपने बयान दे रहे हैं। कुछ सीधे प्रधानमंत्री की राष्ट्रवादी इमेज पर निशाना साधने की कोशिशों में जुटे हुए हैं।

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वर्ष 1962 और वर्ष 2020 के बीच सीमा पर जो हालात हैं, उसमें बहुत असमानताएं हैं। 1962 में भारत-चीन की सशस्त्र सेनाओं के बीच युद्ध लड़ा गया था। तत्कालीन सरकार को अंदेशा था क्योंकि तिब्बत की निर्वासित सरकार और धर्म गुरु दलाई लामा को तत्कालीन सरकार ने भारत में शरण दी थी। तिब्बत के मुद्दे का अंतररराष्ट्रीयकरण होने से चीन, भारत के खिलाफ हो गया था।

वर्ष 2020 के बीच भारत और चीन के बाद युद्ध समाप्त तो क्या आरंभ ही नहीं हुआ है। 15-16 जून की रात को चीन की सेना ने मवालियों की तरह भारतीय सैनिकों पर सुनियोजित हमला किया था। भारत के 20 सैनिक वीरगति को प्राप्त हुए। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश को संबोधित करते हुए कहा था, “भारतीय सेना के जवान भारत माता की भूमि की रक्षा करते हुए मारते-मारते वीरगति को प्राप्त हुए हैं।” उन्होंने संकेत दे दिया था कि चीन की सेना को भारी क्षति हुई है।

यह जगजाहिर है कि चीन कभी भी अंतररराष्ट्रीय नियमों और कानून का पालन नहीं करता है। अंतररराष्ट्रीय मीडिया ने भी माना है कि चीन सेना के अधिकारी और सैनिक भी हताहत हुए। बीजिंग में सोशल मीडिया में भी वायरल हो रहा है, जहां सैनिकों की राख ही परिवारजनों को सौंपी जा रही है।

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चीन में लोकतांत्रिक नहीं बल्कि राष्ट्रपति के रूप में शी जिनपिंग एक तानाशाह है, यह भी पूरा विश्व जानता है। अगर उसकी सेना के सैनिक भारत के मुकाबले कम संख्या में हताहत होते तो वह उसको आसानी से स्वीकार कर लेता। चीन ने अपने हताहत सैनिकों की संख्या बताने से इन्कार कर दिया है। अर्थ साफ है कि वह अपनी हार को स्वीकार कर रहा है।

राजनीति 16 जून के बाद से ही गर्मायी हुई है। कुछ नेताओं ने प्रधानमंत्री को सुरेन्द्र मोदी लिखा। वहीं सच्चाई तो यह है कि अभी तो भारत-चीन के बीच युद्ध आरंभ ही नहीं हुआ। घटना के तुरंत बाद दोनों देशों ने तनाव कम करने के लिए सेनाओं को पीछे कर लिया था।

भारत के हजारों सैनिक आज भी करीबन 35 सौ किमी की भारत-चीन सीमा के निकट कैम्प हुए हैं। भारतीय वायुसेना लगातार एलएसी के निकट उड़ान भर रही है। थल और वायुसेना के अध्यक्ष कह चुके हैं कि वे किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए तैयार हैं।

सेना की मूवमेंट बता रही है कि भारत आपात स्थिति के लिए खुद को तैयार कर चुका है। उधर अमेरिका ने जर्मनी में तैनात अपने सैनिकों की संख्या 52 हजार में से 27 हजार कम करते हुए उसको एशिया के लिए मूव करने के आदेश दिये हैं। तीन जंगी जहाज पहले ही दक्षिणी चीन सागर में तैनात कर दिये गये हैं।

अमेरिका के विदेशमंत्री माइकल पोम्पियो कह चुके हैं कि चीन को कड़ा जवाब देने के लिए सेना को एशिया में तैनात किया जा रहा है।

भारत ही नहीं बल्कि अमेरिका, जापान व अन्य देशों की सेनाएं चीन को चारों तरफ से घेर चुकी हैं। श्री पोम्पियो यह भी कह चुके हैं कि चीन के खिलाफ युद्ध में वे यूरोपियन का भी सहयोग मांगेंगे। इसके लिए वे इन देशों के नेताओं से बात करने वाले हैं।

डोनाल्ड ट्रम्प ने चीन के खिलाफ कड़े प्रतिबंधात्क आदेश जारी कर दिये हैं। अनेक कंपनियों को ब्लैक लिस्टड कर दिया है। उन कंपनियों के साथ व्यापार करने वाले देशों को भी आर्थिक प्रतिबंध झेलने होंगे, इस तरह पूरे विश्व में माहौल चीन के खिलाफ हो चुका है।

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ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन भी चीन के खिलाफ कड़े तेवर दिखा चुके हैं और वुहान लैब की जांच करने वाले वे विश्व के पहले नेता थे। इस कारण चीन ने ऑस्ट्रेलिया से आयात होने वाले कृषि उत्पादों पर टैक्स में बढ़ोतरी कर दी, इसके बावजूद श्री मॉरिसन आज भी अपने बयान पर कायम हैं।

ऐसा नहीं है कि आरोप लगाने वाले इन तथ्यों को जानते नहीं है। वे भी जानते हैं। अगर वे यह सोच रहे हैं कि प्रधानमंत्री टीवी पर संबोधित करते हुए कहेंगे कि भारतीय सेना कब चीन पर हमला करने वाली है या कितने सैनिक संभावित युद्ध में भाग ले सकते हैं, तो उनका इंतजार लम्बा हो सकता है क्योंकि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी देश के सैनिकों की सुरक्षाहितों को ध्यान में रखते हुए कोई बयान देने वाले नहीं हैं।

यह सर्वविदित है कि प्रधानमंत्री तभी देश को बताते हैं जब सेना अपना काम कर चुकी होती है। पाकिस्तान में हुई एयर स्ट्राइक और सर्जिकल स्ट्राइक के जरिये वे प्रमाण भी दे चुके हैं कि वे करते पहले हैं और बताते बाद में हैं। पाकिस्तान को लाशों को ठिकाने लगाने के लिए कई रातें काली करनी पड़ी थीं क्योंकि संख्या इतनी अधिक थी कि सैटेलाइट से बचते हुए आतंकवादियों के शवों को ठिकाने लगाया गया। सवाल यह भी है, क्या सेना की योजना पहले सार्वजनिक की जा सकती है? किसी राष्ट्राध्यक्ष से यह उम्मीद की जा सकती है कि वे सेना की योजना, देश की जनता को सार्वजनिक रूप से पहले बताए।

1962 में दो देशों की सेनाओं के बीच युद्ध था

वर्ष 1962 में भारत और चीन के बीच सशस्त्र युद्ध हुआ था। दोनों देशों ने हथियारों के साथ जंग लड़ी थी। उस युद्ध में हार हुई थी, यह तत्कालीन सरकार ने भी स्वीकार किया था। उस समय रक्षामंत्री कृष्ण मेनन का इस्तीफा सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों की ओर से मांगा गया था।

वहीं 15-16 जून की मध्य रात को सशस्त्र युद्ध नहीं हुआ था। दोनों पक्षों के सैनिक आपस में भिड़ गये थे। तनाव तो इस घटना के तुरंत बाद ही आरंभ हुआ, पहले तो वार्ताओं का दौर चल रहा था, इस कारण भारतीय सेना, चीन के साथ दशकों पहले हुए समझौते के अनुरूप बिना हथियार वहां गश्त करती थी।

उस तनाव को लेकर आज भी दोनों पक्षों के बीच में विभिन्न स्तर पर वार्ता चल रही है। वार्ता से अगर बात नहीं बनती है तो फिर युद्ध को कोई नहीं रोक सकेगा। न सत्तापक्ष और न ही विपक्ष।

हैरानीजनक बात यह भी है कि भारत सरकार में रक्षा मंत्रालय एक कैबिनेट मंत्री के पास है। उस मंत्रालय से सवाल नहीं किया जा रहा। सवाल सीधे प्रधानमंत्री पर उठाये जा रहे हैं जबकि 1962 के युद्ध के समय हार होने के उपरांत भी विपक्ष ने रक्षामंत्री का ही इस्तीफा मांगा था। सीधे पीएम पर निशाना साधना इस बात की ओर इशारा करता है कि चीन के बहाने पीएम नरेन्द्र मोदी की राष्ट्रवादी इमेज पर निशाना साधने की असफल कोशिश ही हो रही है।