CM Nitish Kumar

नई दिल्ली। पूर्वी भारत के बिहार राज्य में प्राकृतिक आपदा ने कहर बरपाया हुआ है। एक तरफ कोरोना वायरस का प्रकोप है तो दूसरी तरफ बाढ़ है जो लोगों के जीवन और उनकी जीवन भर की पूंजी को लील रही है। राज्य सरकार कहां है, उसकी मशीनरी क्या कर रही है, यह कहीं दिखाई नहीं दे रहा।

बिहार राज्य की करीबन 10 करोड़ जनता 38 जिलों में वास करती है ओर इसमें 15 जिले बाढ़ से प्रभावित हैं। गोपालगंज, पूर्वी चम्पारण, पश्चिम चम्पारण, मुजफ्फरपुर, सारण, सीवान, दरभंगा, मधुबनी, सुपौल, पटना, अररिया, कटिहार और किशनगंज आदि जनपद क्षेत्र में बाढ़ ने लोगों को पूरी तरह से प्रभावित किया है।

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बाढ़ का पानी ने रौद्र रूप धारण कर रखा है और जिधर भी जा रहा है, वहां तबाही का मंजर छोड़ जाता है। धार्मिक स्थल भी पानी में डूब चुके हैं। सरकारी दफ्तर, अस्पताल सहित अनेक स्थानों पर पानी घुसने का समाचार मिला है।

एक तरफ कोरोना वायरस ने महामारी का रूप धारण किया हुआ है। इस वायरस के प्रकोप के बीच में भी सबसे निराशाजनक बात वहां स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत नहीं करना भी सरकारी लापरवाही को दर्शाता है। कोरोना वायरस की अधिक जांच नहीं होना, इस बात की ओर इशारा कर रहा है कि जनता को मुकद्दर के सहारे छोड़ दिया गया है।

बिहार और पाकिस्तान सरकार के बीच जो एक समानता है, वह है कि दोनों ही सरकारें कोरोना वायरस के खिलाफ हथियार फेंक चुकी हैं। शुक्रवार को बिहार में 22 हजार 700 के करीब जांच हुई है। पाकिस्तान की ओर से उपलब्ध करवायी गयी अधिकारिक जानकारी के अनुसार शुक्रवार को 20 हजार 507 लोगों की जांच हुई है। इसमें 903 नये केस मिले। पाक में अब तक कुल 19 लाख 73 हजार 237 लोगों की ही स्वास्थ्य जांच हुई है। बिहार में 2986 नये मरीज मिले हैं।

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समाधान कब होगा : बिहार राज्य में मानसून के दौरान बाढ़ प्रत्येक वर्ष आती है। हैरानीजनक बात यह है कि दशकों से इस बाढ़ में कई हजार करोड़ की सम्पत्ति नष्ट हो जाती है, इसके बावजूद इस बाढ़ से बचाव के लिए कोई उपाय आज तक नहीं किये गये हैं। हर वर्ष वहां आपदा राहत के लिए राशि जारी की जाती है, उस राशि से अब तक इस बाढ़ समस्या का स्थायी समाधान हो सकता था।

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मुख्यमंत्री के रूप में गुजरात को विकसित राज्य स्थापित करने के उपरांत नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बने। आज उसी गुजरात में हालात को सामान्य नहीं कहा जा सकता। कोरोना की लड़ाई हो या प्रशासनिक व्यवस्थाओं की, राज्य सरकार पूर्णत: विफल रही है।

सात करोड़ की आबादी वाले राज्य में मात्र पौने आठ लाख ही जांच हो पाई हैं। सरकार अधिकतम जांच की सीमा को 26 हजार तक ही ले जा पाई है। वहीं उत्तर प्रदेश में शुक्रवार को 1 लाख 15 हजार जांच हुई, जो पूरे देश में सर्वाधिक ही नहीं अपितु पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, मध्यप्रदेश आदि राज्यों की एक दिन की जांच को जोड़ दिया जाये तो उससे भी अधिक हुई हैं और इससे प्रमाणित होता है कि उत्तर प्रदेश अपने राज्य की जनता के स्वास्थ्य के प्रति कितना चिंतित है।

मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान स्वयं कोरोना पॉजिटिव हो गये हैं किंतु इसके बावजूद राज्य में जांच का कार्य इतना कम हो रहा है कि हर कोई हैरान है। मध्यप्रदेश में फ्राइडे को 14 हजार जांच हुई और अब तक जांच का आकड़ा आठ लाख भी नहीं पहुंचा है। राजस्थान में 26 हजार के करीब जांच हो रही हैं।

गुजरात सरकार को दिसंबर 2022 में विधानसभा चुनाव का सामना करना है। बड़ौदरा और अहमदाबाद के बाद सूरत शहर भी हॉट स्पॉट बन चुका है और रोजाना अढ़ाई सौ से ज्यादा मरीज मिल रहे हैं। अहमदाबाद में भी 126 रोगी मिले। गांधीनगर और भावनगर के हालात को भी सामान्य नहीं कहा जा सकता।

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मुख्यमंत्री बनने के बाद विजय रूपानी अपनी छाप वहां छोड़ पाये हों, यह कहीं नजर नहीं आता। सरकारी मशीनरी जो जिला और ब्लॉक स्तर पर कार्य करती है, वह विफल हुई प्रतीत होती है।

प्रशासनिक स्तर पर अव्यवस्था किस कदर हैं, इसका एक नहीं अनेक प्रमाण हैं। डिंडोली क्षेत्र में 47 साल की महिला को सांस की तकलीफ हुई तो उसके स्वजन तत्काल निकट के अस्पताल में ले गए, जहां पता चला कि डॉक्टर को ही कोरोना हो गया है और वह क्वॉरेंटाइन में हैं। ऑक्सीमीटर से ऑक्सीजन का लेवल चेक किया तो 80 बताया। महिला को वेंटीलेटर पर रखने की बात आई। अस्पताल में वेंटीलेटर तो था, लेकिन उसे कोई ऑपरेट करने वाला नहीं था। अस्पताल में जगह भी नहीं थी, इसलिए कहा गया कि दूसरी जगह ले जाओ। इसके बाद अनेक स्थानों पर महिला और उसके स्वजन रात भर भटकते रहे। जैसे-तैसे रात कटी।सीटी स्कैन और जांच से पता चला कि वह कोरोना पॉजिटिव है।

दूसरा मामले में सामने आया है कि सूरत के सिविल अस्पताल में महिला की मौत के 11 दिन बाद स्टाफ उसके परिजन को फोन कर बता रहा है कि उसकी मां की हालत ठीक है। मिली जानकारी के अनुसार सूरत के बमरोली इलाके में स्थित गीतानगर में रहने वाली रुकमाबेन सूर्यवंशी (65) की कोरोना कि रिपोर्ट पॉजीटिव आई थी। इसके चलते उन्हें 18 जुलाई को सिविल अस्पताल में भर्ती करवाया गया था। अस्पताल में उपचार के दौरान ही 20 जुलाई को रुकमाबेन का निधन हो गया है। 30 जुलाई को अस्पताल प्रशासन फोन कर उसके बेटे को कहता है कि आपकी मां की तबीयत ठीक है और अब वह दवा भी ले रही है।

यह अव्यवस्था इस कारण उत्पन्न हुई हैं कि कम जांच के कारण कोरोना विस्फोट होने लगा है और अस्पताल प्रशासन पर अब दबाव बढ़ने लगा है। अगर वहां व्यवस्थाओं में जल्दी सुधार नहीं किया गया तो हालात ज्यादा विकट हो सकते हैं।

प्रशासनिक मशीनरी को भी सुधारने के लिए भारी मेहनत की आवश्यकता है। लॉकडाउन के बाद औद्योगिक व्यवस्थाएं आरंभ हो सकें। सरकार की योजनाओं का लाभ आम आदमी तक पहुंच सके, इस तरह का सिस्टम तैयार करने के लिए जो मेहनत होनी चाहिये, वह नहीं दिखाई दे रही है।

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