माता दुर्गा
भगवती दुर्गा के नवरात्रा उत्सव रविवार से आरंभ हो रहे हैं।

नई दिल्ली। आने वाला एक माह भारत में उत्सव के रूप में मनाया जाएगा। नवरात्रि (Navratra Festival) उत्सव के साथ ही एक माह बाजार में खूब खरीददारी होगी और लोग दीपावली त्योहार की तैयारियों में जुट जायेंगे। दीपावली त्योहार 27 अक्टूबर को है। इससे पहले 8 अक्टूबर को दशहरा उत्सव मनाया जायेगा।

नवरात्रि (Navratra Festival) आगामी 29 सितंबर से आरंभ होकर 8 अक्टूबर को विजयदशमी पर्व तक चलेंगे। विजयदशमी पर्व भगवान श्रीराम की असुर रावण पर मिली विजय की याद में मनाया जाता है। इस दिन अहंकारी रावण, मायावी मेघनाथ और आलसी कुंभकरण के पुतलों का दहन भी होता है।

घट स्थापना के लिए अति उत्तम समय प्रात: 8.23 से प्रात: 10.03 बजे तक रहेगा। विद्वान पंडित हेमंत शर्मा बताते हैं कि दुर्गा पूजा के लिए नवरात्रों के दौरान ही समय सर्वोत्तम होता है। मां दुर्गा की फल प्राप्ति के लिए अलग-अलग योग भी बताये गये हैं। उस समय की गयी पूजा संबंधित विषय में अति फलदायी होती है।

क्या कहते हैं हिन्दू धर्म के ज्ञाता

मंत्रों के श्रेष्ठ ज्ञाता पंडित जगतपाल शर्मा का कहना है कि सभी हिन्दुओं को कम से कम 2 उपवास जरूर रखने चाहिये। उन्होंने बताया कि नवरात्रा को नवदुर्गा के नाम से भी जाना जाता है।

 

नवदुर्गा के दौरान माता के सभी नौ अवतार 1. शैलपुत्री, 2. ब्रह्मचारिणी, 3. चंद्रघंटा, 4. कूष्मांडा, 5. स्कंदमाता, 6. कात्यायनी, 7. कालरात्री, 8. महागौरी और 9. सिद्धिदात्री की पूजा की जानी चाहिये।

पंडित जगतपाल शर्मा का कहना है कि प्रथम दिन शैलपुत्री की पूजा की जाती है। शैलपुत्री का अर्थ पर्वत राज हिमालय की पुत्री। यह माता का प्रथम अवतार था जो सती के रूप में हुआ था।

दूसरे दिन ब्रह्मचारिणी का पूजन किया जाता है। ब्रह्मचारिणी अर्थात् जब उन्होंने तपश्चर्या द्वारा शिव को पाया था।

तीसरे दिन चंद्रघंटा की पूजा की जाती है। चंद्र घंटा अर्थात् जिनके मस्तक पर चंद्र के आकार का तिलक है।

चौथे दिन कूष्मांडा का पूजन होता है।  ब्रह्मांड को उत्पन्न करने की शक्ति प्राप्त करने के बाद उन्हें कूष्मांड कहा जाने लगा। उदर से अंड तक वह अपने भीतर ब्रह्मांड को समेटे हुए है, इसीलिए कूष्‍मांडा कहलाती है। माता दुर्गा का यह रूप ही जगतजननी का अवतार है।

स्कंदमाता काे पांचवें दिन पूजा जाता है। नवदुर्गा के इस अवतार को स्कंदमाता इसिलए कहा जाता है क्योंकि उनके पुत्र कार्तिकेय का नाम स्कंद भी है, इसीलिए वह स्कंद की माता कहलाती है। इस तरह से कार्तिकेय को भी जप भी होता है।

छठे दिन मां कात्यायिनी का पूजन होता है। महर्षि कात्यायन की तपस्या से प्रसन्न होकर उन्होंने उनके यहां पुत्री रूप में जन्म लिया था, इसीलिए वे कात्यायिनी कहलाती हैं। मां के इस रूप की पूजा को बहुत ही फलदायी बताया गया है।

कालरात्रि की पूजा सातवें दिन होती है। मां पार्वती काल अर्थात् हर तरह के संकट का नाश करने वाली है इसीलिए कालरात्रि कहलाती हैं। मनुष्य को रात्रि विश्राम करते समय भी कालरात्रि का जाप करना चाहिये, उससे भय ओर चिंता से मुक्ति मिल जाती है। पंडित जगतपाल शर्मा का कहना है कि हर दुख की घड़ी में किया गया स्मरण भक्त को हर संकट से मुक्ति दिलाता है। इसका जाप हिन्दी में इस प्रकार भी किया जा सकता है कि हे दुर्गा आप ने महिषासुर, चण्ड-मुंण्ड, दुर्ग, रक्तबीज जैसे विशालकाय असुरों का संहार किया है। हे दुर्गा आप तो शक्तिशाली हैं। मेरे इस संकट का भी संहार करें। इस तरह के जाप करने से मां भगवती की असीम कृपा बरसती है।

उन्होंने बताया कि महागौरी की पूजा आठवें दिन होती है। माता का रंग पूर्णत: गौर अर्थात् गौरा है इसीलिए वे महागौरी कहलाती हैं।

नवरात्रि उत्सव के आखरी दिन सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। जो भक्त पूर्णत: उन्हीं के प्रति समर्पित रहता है, उसे वह हर प्रकार की सिद्धि दे देती है। इसीलिए उन्हें सिद्धिदात्री कहा जाता है।

दुर्गा पूजा

नवरात्रों के दौरान आठवें नवरात्रा पर कन्या पूजन किया जाता है। इसवको दुर्गा पूजन के नाम से भी जाना जाता है। हिन्दुओं के लिए यह सबसे बडा पर्व होता है। इस दिन छोटी-छोटी बालिकाओं को दुर्गा का रूप मानते हुए उनका पूजन होता है। उन्हें हलवा-पुरी का प्रसाद बनाकर खिलाया जाता है और उपासक उनसे आशीर्वाद प्राप्त कर सात दिन के उपरांत अपने उपवास के क्रम को समाप्त करते हैं।

आठ अक्टूबर को दशहरा उत्सव

दशहरा उत्सव आठ अक्टूबर को मनाया जायेगा। इस दिन असुर रावण के परिवार का अंत हुआ था। उस दिन को विजय दिवस के रूप् में मनाया जाता है। भारत ही नहीं अब अन्य देशों में भी रावण, मेघनाथ और कुंभकरण के पुतलों का दहन किया जाता है। प्रथम नवरात्रि से देशभर में रामलीला का मंचन भी आरंभ हो जाता है।

दीपावली पर्व 27 अक्टूबर को

दीपावली का त्योहार देश भर में कार्तिक अमावस के दिन मनाया जायेगा। अंग्रेजी तारीख के अनुसार 27 अक्टूबर को यह दिवस मनाया जायेगा। इस दिन भगवान श्रीराम की अयोध्या में वापसी हुई थी। वे 14 साल का वनवास की अवधि पूर्ण कर अयोध्यावासियों को दर्शन देने और उनके कष्टों का हरण करने के लिए वापिस आये थे। उनकी इस वापसी के दिन को रोशनी दिवस के रूप में भी मनाया जाता है।

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