जब देवी मां दुर्गा के मंदिरों की चर्चा होती है तो ज्वाला जी मंदिर के प्रति भी उल्लास उमड़ आता है। पंजाब के जालंधर शहर से लगभग 130 किमी की दूरी पर यह शक्तिधाम स्थित है। कांगड़ा तक हवाई मार्ग भी मौजूद है और वहां से मात्र 30 किमी की दूरी पर ही यह मंदिर है, जहां साक्षात दुर्गा के दर्शन पिंडली में नहीं बल्कि ज्योति के रूप में भी होते हैं।

हिमाचल में स्थित ज्वाला जी मंदिर का निर्माण राजा भूमिचंद्र ने करवाया था। इसका पुननिर्माण महाराजा रणजीतसिंह और संसारचंद्र ने भी करवाया।

चिंतापूर्णी मंदिर : सावन और नवरात्रि में जहां लगते हैं विशाल भंडारे

ज्वाला जी मंदिर के साथ ध्यानु भक्त की कथा भी जुड़ी हुई है, जिसकी भक्ति को देखकर शक्ति रूप दुर्गा मां साक्षात अवतरित हुइ्रं।

एकीकृत पंजाब और वर्तमान में हिमाचल प्रदेश नादौन गांव का ध्यानु भक्त बाल्यकाल से ही मां ज्वालाजी का भक्त था और वह गांव-गांव जाकर माता के जागरण किया करता था। कीर्तन करता था। उसकी भजन मंडली मां की महिमा का गुणगान नि:शुल्क करती थी और ध्यानु के जागरण-कीर्तन को सुनकर हर कोई मंत्रमुग्ध हो जाता था। उसके एक-एक शब्द अमृतरूपी होते थे।

उसकी भक्ति को तत्कालीन मुगल बादशाह अकबर ने भी चुनौति दी और मंदिर की आस्था को भी खंडित करने का प्रयास किया जो संभव नहीं हो पाया।

सावन माह 17 जुलाई से, रक्षाबंधन पर होगा सम्पन्न

आज भी जागरण में मां दुर्गा की अनन्य भक्त महारानी तारा की कथा आवश्यक मानी जाती है और उसके बिना जागरण को अधूरा माना जाता है। उसी तरह से माता के हर जागरण में ध्यानु की भक्ति को भी प्रणाम के लिए गीत गाये जाते हैं। कहते हैं कि ध्यानु की भक्ति को देखकर ही मां ने अपना शक्ति स्वरूप साक्षात प्रकट किया।

मंदिर के लिए प्रचलित कथाओं के अनुसार ध्यानु भक्त ने मां के दर्शन के लिए अपना शीश काटकर मां के चरणों में समर्पित कर दिया था। भक्तिभाव को देखकर मां दुर्गा स्वयं प्रकट हुईं और ध्यानु के कटे हुए शीश को पुन: जोड़ा और उसके घोड़े को भी जिंदा किया, जिसकी गर्दन तत्कालीन मुगल सम्राट अकबर ने काट दी थी। 

ध्यानु भक्त और अकबर की कहानी के लिए यहां क्लिक करें

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here