मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को बुखार

यकीन से आगे भी बढ़ना है,
बहुत कुछ करके ऊँचाइयों पर चढ़ना है,
वो हवाओं की ओट में दीपक जलाते हैं,
हम तो तूफानों से टकराकर कारवाँ चलाते हैं।

राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने बजट पढ़ने से पहले यह पंक्तियां पढ़ीं। यह पंक्तियां लोकसभा में केन्द्रीय वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण की ओर से पेश किये गये बजट के दौरान पेश की गयी पंक्तियों का जवाब हो सकती हैं।

निर्मला सीतारमण ने ख्यातिनाम शायर मंजूर हाशमी का शे’र पढ़ते हुए कहा था :

यक़ीन हो तो कोई रास्ता निकलता है
हवा की ओट भी ले कर चराग़ जलता है’

शे’र का जवाब मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने शे’र से ही नहीं दिया बल्कि युवाओं को वित्तमंत्री की तरह निराश भी किया।

राजस्थान में विधानसभा चुनावों में मुद्दा बेरोजगारी था। युवाओं को उच्च शिक्षा के बेहतर अवसर नहीं मिलने का भी था। इन दोनों मुद्दों पर युवाओं ने ही नहीं बल्कि उनके अभिभावकों ने भी कांग्रेस को वोट दिया था।

सरकार को बने हुए छ: माह से ज्यादा हो चुके हैं किन्तु अभी तक युवाओं को वो कुछ नहीं मिला, जिसके लिए उन्होंने सत्ता परिवर्तन करवाया था।

मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने वित्तमंत्री के रूप में इस कार्यकाल का पहला बजट पेश किया। बजट में सामाजिक विकास के लिए काफी कुछ कहा जा सकता है। सबसे बड़ी राहत उन्होंने पेयजल को प्राथमिकता देकर दी। उन्होंने पेयजल के लिए बड़ी राशि का प्रावधान किया है। इसके लिए वे बधाई के पात्र हैं। अनेक जिलों के करोड़ों लोगों को उन्होंने यह आशा की किरण दिखायी है कि उनके घर पर भी नल से स्वच्छ पेयजल आयेगा।

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अगर यह कार्य ईमानदारी और मुख्यमंत्री की निगरानी में होता है तो निश्चित रूप से आने वाले कुछ महीनों में दर्जनों शहरों में स्वच्छ पेयजल उपलब्ध हो जायेगा। लाखों नहीं करोड़ों लोगों की दुआएं मुख्यमंत्री के पास जायेंगी। अपनी आदत के मुताबिक अधिकारी कागजों में ही पेयजल लाइन बिछा देते हैं तो फिर इन इलाकों के लोगों को अगले 50 साल तक पानी नहीं मिलेगा।

अब यह जिम्मेदारी अलवर, भरतपुर, झुंझुनूं, नागौर, पाली, दौसा, सवाईमाधोपुर आदि जिलों के वासियों की भी यह ड्यूटी बन गयी है कि वे इस पेयजल योजना पर निगरानी के लिए अपना तंत्र भी विकसित करें ताकि उनकी युवा पीढ़ी को पेयजल के लिए कई किमी तक नहीं भटकना पड़े। नल से पानी उनके लिए स्वप्न था जो मुख्यमंत्री की कार्यप्रणाली से पूर्ण होने वाला है, उसके लिए वे भी सजग रहें।

चुरू के तारानगर तहसील क्षेत्र में कुंभाराम लिफ्ट कैनाल से सिंचाई पानी देने का भी आश्वासन दिया गया है।

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पेयजल परियोजनाओं के लिए बड़ी राशि आवंटित हुई है तो यह प्रशंसा के योग्य है किंतु सरकार ने युवा वर्ग को भी बिलकुल ही अनदेखा कर दिया।

सरकार ने अपने बजट में एक भी मेडिकल कॉलेज,  डेंटल कॉलेज, आयुर्वेदिक कॉलेज की घोषणा नहीं की। सरकार ने युवाओं को उच्च शिक्षा के लिए आसान लोन दिलाने के लिए भी कोई प्रावधान नहीं किया। केन्द्रीय आईआईटी की तरह राज्य सरकार भी अपना इंस्टीट्यूट बना सकती थी।

श्रीगंगानगर में मेडिकल कॉलेज निर्माण शुरू करवाने की बात कही गयी है किंतु बजट में एक रुपया की राशि का प्रावधान नहीं किया गया है। बिना बजट कैसे निर्माण कार्य पूरा हो पायेगा।

सरकार जिस तरह से किसानों को सहकारी बैंकों से सस्ते ऋण दिलाती है, उसी तरह की व्यवस्था शहरी क्षेत्र में स्वरोजगार के लिए भी की जा सकती थी।  यह बैंक सीधे राज्य सरकार के अधीन हैं।  अगर इन बैंकों के पास कैश प्रवाह कम था तो सरकार आरबीआई अथवा वित्तीय संस्थान से भी लोन ले सकती थी। सरकार ने किसानों का लोन माफ करने के नाम पर आरबीआई से ऋण लिया है तो बेरोजगारों को स्वरोजगार देने के लिए भी लिया जा सकता था।

यह भी प्रावधान किया जा सकता था कि निर्धारित राशि तक सरकार सार्वजनिक क्षेत्रों से अपनी गारंटी पर विदेश में शिक्षा के लिए लोन दिलाने का प्रावधान कर सकती थी।

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कांग्रेस स्वयं प्रधानमंत्री की मुद्रा योजना में 1 लाख लोन देने को अव्यवहारिक बता चुकी है। कांग्रेस के बयान रहे हैं कि एक लाख रुपये की राशि में स्वरोजगार आरंभ नहीं हो सकता। वहीं राज्य सरकार ने इस बजट में भी 25 हजार युवाओं को एक-एक लाख रुपये तक के लोन देने का प्रावधान किया है।

सरकार ने निवेश का माहौल बनाने का प्रयास अवश्य किया है, किंतु यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि राज्य की सत्ता संभालने वाली पार्टियां हर साल बजट में निवेश लाने के लिए घोषनाएं तो करती है किंतु उस तरह का माहौल नहीं बनाया जा सका है कि निवेशक अपना पैसा राजस्थान में लगा सकें। यह योजनाएं कागजों में ही धरी रह जाती हैं।

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