केसरीसिंहपुर में फायरिंग : घायल युवक की मौत, पुलिस के समक्ष पुख्ता सबूत जुटाना चुनौती

राजस्थान के श्रीगंगानगर जिले में पुलिस के सामने एक बड़ा केस आया है। फायरिंग से बचते हुए युवकों का वाहन एक ट्रॉले से टकरा जाता है और कार चालक की ईलाज के दौरान गुरुवार को मौत हो गयी। पीडि़त परिवार को न्याय मिले, इस सिद्धांत के आधार पर पुलिस को साक्ष्य जुटाने के लिए कड़ी मेहनत की आवश्यकता होगी ताकि अदालत में पेश किये जाने वाले आरोप पत्र को तथ्यों सहित साबित किया जा सके।

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श्रीगंगानगर (टीएसएन)। राजस्थान के श्रीगंगानगर जिले में पुलिस के सामने एक बड़ा केस आया है। फायरिंग से बचते हुए युवकों का वाहन एक ट्रॉले से टकरा जाता है और कार चालक की ईलाज के दौरान गुरुवार को मौत हो गयी। पीडि़त परिवार को न्याय मिले, इस सिद्धांत के आधार पर पुलिस को साक्ष्य जुटाने के लिए कड़ी मेहनत की आवश्यकता होगी ताकि अदालत में पेश किये जाने वाले आरोप पत्र को तथ्यों सहित साबित किया जा सके।

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घटनाक्रम में जो जानकारी सामने आयी उसके अनुसार मंगलवार को केसरीसिंहपुर में उधमसिंह चौक पर चार युवक एक कार में सवार होकर बातचीत कर रहे थे। इस दौरान कुछ लोग आये और उन पर फायरिंग कर दी। फायरिंग से बचने के लिए युवकों ने कार को भगा लिया और कुछ दूरी पर कार अनियंत्रित होकर एक ट्रॉले से टकरा गयी। कार में सवार चारों सुनील कुमार, राजकरण, सुच्चा सिंह और मनप्रीत सिंह घायल हो गये। चालक सुनील के गंभीर चोट आयी थी और वह अस्पताल में उपचाराधीन था। जिला मुख्यालय स्थित राजकीय चिकित्सालय में गुरुवार को उसने दम तोड़ दिया। परिवारजनों ने आरोपितों की गिरफ्तारी की मांग को लेकर हंगामा किया। पुलिस अधिकारियों ने मौके पर पहुंचकर समझाइश की, जिसके उपरांत वे लोग शांत हुए।

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पुलिस अधीक्षक आनंद शर्मा ने बताया कि सुनील नामक युवक की मौत हो गयी है। उसके शरीर पर जाहिरा गोली लगने के निशान नहीं मिले हैं। फिलहाल पोस्टमार्टम रिपोर्ट का इंतजार है।

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पुलिस के एक अधिकारी ने ही स्वीकर किया कि विभाग के समक्ष असली चुनौति अपराधियों को पकडऩे की नहीं बल्कि पीडि़त परिवार को न्याय दिलाने की है। आरोपित पहचाने जा चुके हैं और नामजद भी हैं। वह अगले कुछ घंटों/दिनों में गिरफ्तार भी हो जायेंगे, लेकिन उन पर धारा 302 को प्रमाणित नहीं किया जा सकेगा, अगर पोस्टमार्टम रिपोर्ट में कॉज ऑफ डेथ फायरिंग से नहीं होना पाया जाता है।

केसरीसिंहपुर पुलिस थाना में एफआईआर नंबर 218 दर्ज करवाते हुए मुस्तगिस ने 9 जनों को नामजद करवाया है। पीडि़त परिवार स्वयं दलित हैं। वहीं आरोपी अनेक जातियों से हैं, इस कारण जांच एससी-एसटी के डिप्टी एसपी को दी गयी है। परिवादी का आरोप है कि आरोपितों ने कार के दुर्घटनाग्रस्त होने के उपरांत भी तेजधार हथियारों से हमला किया। पुलिस अधिकारी का कहना था कि एफआईआर के मजमून को देखा जाये तो इससे सामने आता है कि भरे बाजार में कार के दुर्घटनाग्रस्त होने के उपरांत भी घायलों को पीटा गया। जबकि कार ट्रक के पीछे बुरी तरह से फंस गयी थी। अब कार ट्रक के पीछे फंसी हुई थी, उस समय कार में सवार लोगों पर हमला करना आसान नहीं था। तीन अन्य लोग भी घायल हैं।

अगर उनके शरीर की मेडिकल रिपोर्ट में गोली या छर्रे लगना नहीं पाया जाता है तो पुलिस को 307 आईपीसी में भी चालान पेश करने में आसानी नहीं होगी। उस समय 337 आईपीसी में चार्ज लगाना होगा। पुलिस अधिकारी के अनुसार ट्रक चालक पर अगर 304ए (गैर इरादा हत्या) का आरोप भी लगाया जाता है तो उसका वाहन खड़ा हुआ था। नो पार्किंग में वाहन खड़े करने को पुलिस आधार मनाते हुए उसके खिलाफ भी चालान पेश कर सकती है किंतु वहां चालक सवार नहीं था। इस तरह से मेडिकल और पोस्टमार्टम रिपोर्ट पुलिस के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है। वहीं पीएम करने वाले वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. प्रमोद चौधरी भी कहते हैं कि सुनील को घायलावस्था में जो इलाज दिया जा रहा था, उसकी फाइल उपलब्ध करवाने के लिए कहा गया है।

ध्यान देने योग्य यह भी है कि कानून की यह वह कमजोरियां हैं, जिनसे गंभीर अपराध के समय भी आरोपितों को लाभ मिलने की संभावना रहती है। उस समय पुलिस को अपनी जांच को व्यवहारिक बनाये जाने की आवश्यकता होती है।

VIASatish Beri
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