सांध्यदीप समाचार
एक इलेक्ट्रॉनिक्स शोरूम के संचालक ने की आत्महत्या

श्रीगंगानगर। जो यह कहते हैं कि सुख-दुख कर्मों का फल होता है तो आज शनिवार को श्रीगंगानगर में हुई एक दर्दनाक घटना ने इस मिथ्या को एक बार पुन: तोड़ दिया है। जिस युवक ने आत्महत्या की है, उसके पिता की समाज के प्रति समर्पण, धार्मिक आस्था, एक मददगार दोस्त के रूप में मान्यता आज से नहीं दो दशक से भी अधिक समय से रही है।

शनिवार प्रात: राजस्थान के श्रीगंगानगर जिला मुख्यालय पर एक और युवा ने आत्महत्या कर ली। इसी तरह की घटना कुछ ही दिन पहले सादुलशहर की एक नर्सिंग छात्रा के साथ हुई थी। उस युवती ने कॉलेज प्रशासन से दुखी होकर आत्महत्या कर ली। इसके वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हुए हैं लेकिन प्रशासन ने अभी तक कोई भी कार्यवाही नहीं की है।

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मटीली राठान थाना पुलिस के अनुसार 27 वर्षीय आशु मक्कड़ ने आत्महत्या कर ली। सराय रोहिला रेलगाड़ी के आगे कूदकर उसने यह आत्महत्या की। वह पुरानी आबादी के उदाराम चौक क्षेत्र का रहने वाला है। पृथ्वीराजपुरा रेलवे स्टेशन के निकट यह घटना हुई।

पुलिस के अनुसार आशु के पिता केशवानंद मक्कड़ की मुख्य बाजार में कपड़े की दुकान है।

केशवानंद मक्कड़ ने संघर्षपूर्ण युवा जीवन को व्यतीत करते हुए श्रीगंगानगर में अपनी पहचान बनायी।

श्री मक्कड़ की पहचान बाजार ही नहीं अपितु पूरे श्रीगंगानगर शहर में धार्मिक आस्थावान, समाज को समर्पित की रही है। आज तक उनके साथ ऐसा विवाद नहीं रहा हो, जिससे यह कहा जाता हो कि उन्होंने कोई बुरा कर्म किया है।

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उनके युवा पुत्र की मौत हुई है और इससे बड़ा दुख उनके जीवन में नहीं हो सकता। जो इस मिथ्या का प्रचार करते हैं या समर्थक कहलाते हैं कि अच्छे-बुरे कर्मों का फल सुख-दुख का कारण होता है तो उनको श्री मक्कड़ के जीवन को पड़ना चाहिये। उनको एक भी ऐसा कर्म नहीं मिलेगा, जिससे इस मिथ्या को प्रमाणित किया जा सके।

जो यह समाचार पढ़ रहे होंगे, यह संभव है कि उनमें से अधिकांश के लिए कल तक भूल जाने वाली घटना हो, लेकिन सच यह है कि अच्छे लोगों के साथ  जब बहुत ज्यादा बुरा हो जाता है तो बहुत से अच्छे लोग इस घटना को नहीं भूल पाते।

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जो लोग आत्महत्या के कारणों पर रिसर्च करते हैं, उनमें 99 प्रतिशत ने यह पाया है कि 80 प्रतिशत लोग भावनाओं में आकर आत्महत्या कर लेते हैं। उस समय उनको इमोशन यह कहते हैं कि अब जीवन जीने का कोई अधिकार नहीं है। अगर वे कुछ देर आराम से विचार करें तो उनको लगेगा कि वह गलत कदम उठा रहे थे। आशु का भी यह कदम सिर्फ एक पल के लिए आया विचार ही था और इस विचार से उसने जीवन लीला को समाप्त कर लिया। माता-पिता को यादों के भरोसे छोड़ गया।

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