हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में देवी माता ज्वाला जी मंदिर है। यह चिंतापूर्णी माता मंदिर से करीबन 30 किमी की दूरी पर है। पहाड़ी इलाका होने के बावजूद चौड़े मार्ग हैं जिस कारण एक घंटे से भी कम समय से छिनमस्तिका मंदिर से वहां पहुंचा जा सकता है। जब माता ज्वाला जी की बात होती है तो मुगल अकबर के अहंकार और मां के भक्त ध्यानु पर ढहाये गये जुल्मों की बात नहीं हो, यह हो नहीं सकता।

मुगल अकबर का अहंकार
हमें भले ही इतिहास में मुगल अकबर को महान बताया हो, लेकिन वह भी अपनी क्रूरता के लिए हिन्दुओं में जाना जाता था। उसने अपनी क्रूरता से ज्वाला जी मंदिर की श्रद्धा को भी खंडित करने का प्रयास किया किंतु वह कामयाब नहीं हो सका। भक्त ध्यानु का सम्मान सुरक्षित रखने के लिए मां दुर्गा ने साक्षात दर्शन दिये और बादशाह अकबर को उसकी असली जगह का अहसास करवाया। यह शक्तिपीठ ऐसा है, जहां आज भी मां दुर्गा की शक्ति के साक्षात दर्शन होते हैं।

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भक्त ध्यानु पर ढहाये मुगलों ने जुल्म
मंदिर के इतिहास के अनुसार ज्वाला जी मंदिर देवी शक्ति के 51 शक्तिपीठों में से एक है। सनातनकाल से पहले ही मंदिर में रोजाना हिन्दुओं का आना-जाना था। यहां के प्रति बहुत ही आस्था थी। इसका कारण भी था, यहां देवी दुर्गा साक्षात विराजमान थी। बिना घी और तेल के ज्योति 24 घंटे प्रकट रहती थी। इसके बार प्रमाण मिले। रात्रिकालीन समय में शेर वहां मंदिर की रखवाली और सेवा करने आया करता था। यह बात जग प्रसिद्ध् थी। इस दौरान मां के अनन्य भक्त ध्यानु का उदय हुआ। वह बचपन काल से ही देवी दुर्गा की महिमा का गुणगान किया करता था और ज्वाला जी मंदिर में सेवा किया करता था। उसकी सेवा भाव का प्रताप था कि अनेक असिद्ध रोगी ठीक हो रहे थे। लोगों की मनोकामना ध्यानु के कीर्तन में शामिल होने से पूरी हो रही थी। यह बात तत्कालीन मुगल बादशाह अकबर को मिली। उसने मंदिर की आस्था को खंडित करने के लिए मंदिर के शक्ति रूप ज्योति पर लोहे के भारी-भरकम तवे रखवा दिये। ज्योति स्वरूप देवी दुर्गा ने अपनी शक्ति का परिचय दिया। मुगल आक्रमणकारी को उसकी सही दिखाने के लिए ज्योति को तवों के ऊपर भी अपने प्रकाश से जगमगा दिया। अकबर के सिपाहसलारों ने इसकी खबर अकबर को दी तो उन्होंने पानी की धारा का मुंह मंदिर की ओर कर दिया। मंदिर में पानी भर गया क्योंकि मां का शक्ति रूप ज्योति पानी के बीच में भी बिना तेल और घी के प्रकाश होती रही। मंदिर की आस्था को खंडित रहने के बाद ध्यानु को मुगल सैनिकों ने बंधक बना लिया। उसके घोड़े का शीश काटकर यह शर्त रख दी कि अब वह देवी दुर्गा को कहे कि उसके घोड़े का शीश रातों-रात जोड़ दे। अगर सुबह तक घोड़ा पुन: जीवित नहीं हुआ तो उसको मार दिया जाये। मुगल बादशाह के अहंकार और कूरता की यह हदें पारी करने वाली शर्त थी। ध्यानु ने मन ही मन शक्ति स्वरूप देवी दुर्गा को याद किया और अपने सम्मान के लिए पुकारा। देवी मां दुर्गा ने अपने भक्त ध्यानु के सम्मान और जीवन की रक्षा के लिए घोड़े के सिर को पुन: जोड़ कर जीवित कर दिया। उसी घोड़े को पुन: जीवित देखकर मुगलों को पता चल गया कि भक्ति में शक्ति होती है। ज्वाला जी मंदिर सनातनकाल का शक्तिपीठ है। अब अकबर मंदिर में अपनी भूल की माफी के लिए पहुंच गया। वह सोने का छत्र लेकर गया था। वहां उसने मंदिर पर छत्र चढ़ाया तो एक बार फिर से उसने कहा कि देखो मां, आज तक तुम्हारे मंदिर पर इतना विशाल सोने का छत्र नहीं चढ़ाया था। मैं ऐसा करने वाला पहला बादशाह हूं। इतना कहते ही छत्र का रंग बदल गया। वह न पीतल का रहा, न सोने का और न ही चांदी का। आज भी यह छत्र मंदिर प्रशासन के पास मौजूद है। सदियां बदल गयीं किंतु आज तक अनेक विद्वान नहीं जाने पाये कि यह छत्र अब किस धातु का है।

अंग्रेजों ने भी शक्ति को दी थी चुनौति
मुगलकाल के बाद अंग्रेजों ने भारत पर शासन किया। जब उन्हें पता चला कि ज्वाला जी मंदिर में ज्योति बिना घी और बिना तेल अखंड प्रकाश करती है तो उन्होंने भी मंदिर को चुनौति देने का प्रयास किया। अंग्रेजों ने मंदिर के आसपास के स्थान पर खुदाई करवायी और यह जांचने का प्रयास किया आसपास गैस का भंडार होगा, उसी से यह ज्योति प्रकाशमय हो रही है। पहाड़ों पर खुदाई के बाद भी उन्हें गैस या अन्य ज्वलनशील पदार्थ नहीं मिला। अंत में उन्होंने भी स्वीकार किया कि यहां अवश्य ही वो शक्ति विद्यमान है, जिसकी पूजा की जाती है।

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आज भी अखंड ज्योत है प्रज्जवलित

देवी शक्ति के 51 शक्तिपीठों में शामिल ज्वाला जी को ज्वालामुखी भी कहते हैं। शिव तांडव के उपरांत भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र से देवी सती के शरीर के भागों को विभाजित किया गया था तो यहां पर माता की जीव्हा गिरी थी जो अब ज्योति स्वरूप में विद्यमान है। इस ज्योति को प्रकाश के लिए न तो घी की आवश्यकता है और न ही तेल की। सदियों से यह ज्योत अखण्ड प्रज्जविलत हो रही है। लोग हजारों की संख्या में देवी के दर्शन करने के लिए पहुंचते हैं।

विशाल है मां का मंदिर

ज्वाला जी का मंदिर बहुत ही विशाल परिसर में बना हुआ है। मां के अनन्नय भक्त बाबा गौरखनाथ का मंदिर भी यहां बना हुआ है। मंदिर का प्रथम बार निर्माण राजा भूमिचंद ने करवाया था। इसके बाद पंजाब रियासत के राजा रणजीतसिंह और संसारचंद ने करवाया। अब भक्तों की ज्यादा भीड़ को देखते हुए प्राचीन मंदिर से इतर मंदिर परिसर में ही नया भवन भी बनाया गया है। इसके अतिरिक्त एक म्यूजियम भी बना हुआ है जिसके चित्र मंदिर के इतिहास के बारे में जानकारी देते हैं।

उच्चतम है रात्रि निवास की व्यवस्था

मंदिर के आसपास अनेक धर्मशाला और होटल बने हुए हैं। उनके लिए रात्रि निवास की बेहतर व्यवस्था होती है। यहां भी हलवे का प्रसाद चढ़ाया जाता है। मंदिर में पंजाब, हिमाचल ही नहीं अपितु उत्तरप्रदेश, गुजरात, मध्यप्रदेश, राजस्थान आदि राज्यों से भी रोजाना हजारों की संख्या में आते हैं। नवरात्रि के दौरान अत्यधिक भीड़ रहती है।

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