महात्मा गांधी मेडिकल मार्केट विवाद : स्टाम्पधारियों को डराया-धमकाया और ललचाया जा रहा है

एक बार बेची जा चुकी प्रोपर्टी को पुन: बेचे जाने की तैयारियां की जा रही थीं कि इस बड़े फर्जीवाड़े का पर्दाफाश एक खातेदार की सक्रियता से हो गया। जयपुर निवासी पवन गुप्ता ने इस मामले में भारी दबाव और बुरे दिन देखने के बाद भी हिम्मत नहीं हारी और अपने व अन्य लोगों के अधिकारों के लिए संघर्ष को जारी रखा।

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श्रीगंगानगर (टीएसएन)। एक बार बेची जा चुकी प्रोपर्टी को पुन: बेचे जाने की तैयारियां की जा रही थीं कि इस बड़े फर्जीवाड़े का पर्दाफाश एक खातेदार की सक्रियता से हो गया। जयपुर निवासी पवन गुप्ता ने इस मामले में भारी दबाव और बुरे दिन देखने के बाद भी हिम्मत नहीं हारी और अपने व अन्य लोगों के अधिकारों के लिए संघर्ष को जारी रखा।

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महात्मा गांधी मेडिकल मार्केट को लेकर एक या दो नहीं बल्कि अनेक लोग पीडि़त हैं। एक पीडि़त तो भूमि का खातेदार होने के उपरांत भी 20 दिन तक जेल की हवा भी खा चुका है। मुरब्बा नंबर 62 इसको 58/62 के नाम से भी जाना और पुकारा जाता है। उस भूमि को नई धानमंडी के निर्माण के समय अधिग्रहण कर लिया गया था।

किला नंबर 3 से 25 तक भूमि के मालिक व्यापारिक परिवारों के सदस्य थे और उन्होंने साम-दाम-दण्ड-भेद नीति को अपनाकर अधिग्रहण की कार्यवाही से इस भूमि को मुक्त करवा लिया। अगर अधिग्रहण की कार्यवाही मुकम्मल हो जाती तो मंडी में 50 से ज्यादा और ज्यादा दुकानें बन जाती।

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राजस्व विभाग के अनुसार मुरब्बा नंबर 62 के खातेदार नौरंगराम पुत्र मातूराम बंसल, चंद्रावली पत्नी सोहनलाल, सोहनलाल पुत्र गुलाराम, सुरेन्द्र कुमार गर्ग ‘काकाÓ पुत्र बनारसी दास, राजेन्द्र कुमार पुत्र किशन गोपाल, राजकुमार पुत्र रामजीलाल, पवन कुमार पुत्र शिबाराम, पवन कुमार पुत्र राधाकृष्ण हैं। खाता नंबर 21 है। राजस्व विभाग का रिकॉर्ड यह भी बताता है कि भूमि का बंटवारा नहीं हुआ।

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इसके उपरांत भी पांच बीघा भूमि पर 85 से ज्यादा दुकानों का नक्शा बनाया गया और इसको बेचने की तैयारी की जा रही है। मूल्य प्रति दुकान 50 लाख रुपये से ज्यादा का रखा गया है। अगर इस भूमि की पृष्ठभूमि को खंगाला जाये तो सामने आता है कि 1990 में ही दुकानों को स्टाम्प पर बेचने का धंधा आरंभ हो गया था। इन सभी खातेदारों का एड्रैस 38 गोल बाजार बताया गया है, जबकि वहां पर गणेशगढिय़ा परिवार की दुकान है और कपड़े व घड़ी आदि का कार्य होता है। दुकान दो भागों में विभाजित है।

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चाय व्यापार संघ के पूर्व अध्यक्ष सुरेन्द्र गर्ग काका व डॉ. प्रदीप गर्ग के पिता बनारसी दास ने श्रवण मल्होत्रा व विजय अग्रवाल से दुकानों की बिक्री करवायी। न तो श्रवण खातेदार था और न ही विजय अग्रवाल। विजय अग्रवाल बनारसीदास गर्ग का दामाद और पीडि़त पवन गुप्ता का कजन है।
बनारसी दास ने इसी कड़ी के तहत एक दुकान संतोषी माता मंदिर के पास खालसा स्टोर के नाम से व्यवसायिक कार्य करने वाले देवेन्द्रसिंह के भाई को बेच दी थी। देवेन्द्रसिंह के भाई का आकस्मिक निधन हो गया। इस परिवार को 30 सालों के उपरांत भी दुकान का स्वामीत्व नहीं दिया गया है।

परिवार को कई सालों तक कागजात पेश करने के लिए ही बार-बार टकराया जाता और इसके बाद एक बार पीएमजी अस्पताल में बैठक आयोजित की गयी। बैठक में सुरेन्द्र गर्ग काका के कजन डॉ. प्रवीण गर्ग और अन्य लोग थे। लम्बी बैठक में इनको प्रभावशाली लोगों के दबाव के कारण दबाने की कोशिश भी की गयी किंतु यह प्रयास कामयाब नहीं हो पाया। देवेन्द्रसिंह बताते हैं कि उनको 1990 से लेकर अभी तक दुकान का मालिकाना हक नहीं मिल पाया है।

ध्यान देने योग्य बात यह भी है कि सुरेन्द्र गर्ग ने पवन गुप्ता की पत्नी को अपनी बहन बनाया हुआ है। पवन गुप्ता बताते हैं कि वे जब अपने अधिकारों के लिए कोर्ट-कचहरी के चक्कर काट रहे थे तो उन पर झूठा मुकदमा बनाया गया और राजनीतिक दबाव में जेल भी भेज दिया गया। 21 दिनों बाद उनको जमानत मिल पायी।

इसके उपरांत समझौते के लिए दबाव बनाया गया और 1 बीघा भूमि का मालिकाना हक होने के उपरांत उनको सिर्फ दो दुकानों का ही पट्टा दिलाया गया, जबकि पांच बीघा में 85 से ज्यादा दुकानें थीं। अभी तक वहां पर सड़क, सीवरेज, पेयजल, बिजली आदि का कार्य भी नहीं करवाया गया और दुकानों की पुन: बिक्री के लिए प्रयास आरंभ कर दिये गये।

VIASatish Beri
SOURCESandhyadeep Team
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