महात्मा गांधी मेडिकल मार्केट विवाद : सुरेन्द्र गर्ग ‘काका’ का बहनोई, भाई बन बेच गया दुकान

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श्रीगंगानगर (टीएसएन)। संयुक्त व्यापार मंडल के उपाध्यक्ष, चाय व्यापार संघ के पूर्व अध्यक्ष सुरेन्द्र गर्ग ‘काकाÓ के परिवार ने किस तरह से लोगों को ठगी का शिकार बनाने के लिए साजिश रची, इसकी परतें धीरे-धीरे लोगों के सामने आ रही हैं।

महात्मा गांधी मार्केट : खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे!

काका के पिता बनारसीदास ने लोगों को बहला-फुसलाकर दुकानें बेचने का धंधा आरंभ किया था। बनारसीदास एक दिन यातायात थाना पुलिस की रविन्द्र पथ पर बनी गुमटी के गिर जाने से उसके नीचे दबकर दिवंगत हो गये थे।

इसके उपरांत बनारसीदास के भतीजे प्रवीण गर्ग आदि ने मिलकर एक नयी कहानी बनायी, जबकि प्रवीण और सुरेन्द्र गर्ग के बहनोई विजय अग्रवाल ने भी कारनामा कर दिया। विजय ने स्वयं को बनारसीदास का पुत्र बताकर कुछ लोगों को स्टाम्प पर दुकानें बेच गया।

महात्मा गांधी मेडिकल मार्केट : 1990 के दशक में रची गयी थी साजिश

महात्मा गांधी मेडिकल मार्केट को लेकर हर रोज नया खुलासा हो रहा है। खुलासा भी ऐसा कि काका, प्रवीण गर्ग, विजय अग्रवाल को व्यापारी लिखा जाये अथवा क्रिमिनल इस पर भी विचार करने की आवश्यकता हो जाती है।

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प्रवीण गर्ग ने जो गंभीर अपराध किया था, उसको सांध्यदीप ने विस्तार से गत दिवस ही प्रकाशित कर दिया था।

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इसके बाद नया अपराध रचा गया, वह भी किसी सनसनीखेज स्टोरी से कम नहीं है। अगर इस पर वेज सीरिज बनायी जाये तो यह मिर्जापुर को भी पीछे छोड़ देगी।.

 

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सुरेन्द्र गर्ग उर्फ काका का बहनोई है, विजय अग्रवाल। पहले श्रीकरणपुर में निवास करता था। यहीं पर एक अन्य खातेदार पवन गुप्ता का भी नाम आ जाता है। पवन गुप्ता और विजय अग्रवाल कजन हैं। पवन गुप्ता के अनुसार विजय अग्रवाल के पिता का नाम कौर चंद है। अगर नगर विकास न्यास का रिकॉर्ड देखा जाये तो चक 1 ए छोटी के मुरब्बा नंबर 62 (पुराना 58) के पट्टा नंबर 4274 और 4275 विजय अग्रवाल पुत्र कोर चंद के नाम पर ही जारी किया गया है। यह पट्टा 15 जून 2015 को जारी किया गया।

 

उसी विजय अग्रवाल पुत्र कौर चंद ने एक दुकान का विक्रय राकेश कुमार पुत्र श्रीकृष्णलाल अरोड़ा निवासी श्रीगंगानगर को विजय पुत्र बनारसीदास बनकर स्टाम्प पर कर दिया। पांच हजार रुपये मूल्य राशि अंकित की गयी। इस स्टाम्प पर विजय कुमार ने यह अंकित नहीं करवाया कि उक्त भूखण्ड उसने किस व्यक्ति से कब खरीदा था। स्टाम्प के अनुसार यह सौदा 28 जनवरी 1991 को किया गया।

 

ध्यान देने योग्य बात यह है कि विजय अगवाल पुत्र कौर चंद बनारसीदास गर्ग का दामाद और सुरेन्द्र गर्ग काका, प्रदीप गर्ग, प्रवीण गर्ग का बहनोई था। उसने इस जगह को मुफ्त की समझी। अगर राजस्व विभाग का रिकॉर्ड देखा जाये तो सुरेन्द्र गर्ग काका के नाम पर जो जमीन है।

 

वहीं प्रवीण गर्ग भी उसमें परिवार का सदस्य होने के नाते पार्टनर बताया गया है।
वहीं राजेन्द्र गोयल, जो चाय का विक्रेता हैं, का निधन 1 मई 2021 को हो चुका है। उसकी पॉवर ऑफ अटार्नी दो व्यापारियों के पास होने की जानकारी सामने आयी है। इस तरह से महात्मा गांधी के नाम पर एक बड़े घोटाले की साजिश रची जा रही है।

 

इस तरह के अनेक अन्य लोग भी हैं, जो स्टाम्प लेकर घूम रहे हैं, जिनको दुकान का निशान, कब्जा नहीं दिया गया और विभिन्न नामों से दुकानों का विक्रय स्टाम्प पर किया हुआ है।

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