Thursday, February 2, 2023
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भारत में नोटों की छपाई कौन करता है? मनमोहनसिंह के जादू उपरांत बदला भारतीय मुद्रा का स्वरूप

अगर भारतीयों से यह सवाल किया जाये कि भारतीय मुद्रा की छपाई का कार्य कौन करता है? एक वर्ष में कितने नोट की छपाई हुई तो इसकी जानकारी कौन देगा? 90 प्रतिशत उत्तर देंगे-आरबीआई! क्या वास्तव में ऐसा होता है? 'द सांध्यदीपÓ के सहयोगियों की एक टीम अमीर-गरीब के बीच बढ़ती खाई पर बड़ी रिसर्च कर रही है। इस टीम में वे लोग हैं जो अर्थशास्त्र को जानते हैं और भारतीय सिस्टम को समझते हैं।

  • कांग्रेस के शासनकाल के लीकेज को नहीं रोक पाई निर्मला सीतारमण

  • तीन सालों से दो हजार के नोट की छपाई बंद

नई दिल्ली (टीएसएन)। अगर भारतीयों से यह सवाल किया जाये कि भारतीय मुद्रा की छपाई का कार्य कौन करता है? एक वर्ष में कितने नोट की छपाई हुई तो इसकी जानकारी कौन देगा? 90 प्रतिशत उत्तर देंगे-आरबीआई! क्या वास्तव में ऐसा होता है?

‘द सांध्यदीपÓ के सहयोगियों की एक टीम अमीर-गरीब के बीच बढ़ती खाई पर बड़ी रिसर्च कर रही है। इस टीम में वे लोग हैं जो अर्थशास्त्र को जानते हैं और भारतीय सिस्टम को समझते हैं। अगर देश के प्रमुख 15 उद्योगपतियों-व्यापारियों की कुल सम्पत्ति का ब्यौरा जुटाये जाये तो यह करीबन 40 लाख करोड़ के करीब हो जाता है। यह भारत सरकार के एक साल के कुल बजट के बराबर है। वहीं दूसरी ओर देखते हैं तो करोड़ों लोग आज भी घर की तलाश में हैं। सिर के ऊपर छत नहीं और सरकारी योजना नहीं हो तो दो वक्त का भोजन मिलना भी मुश्किल है। सार्वजनिक वितरण प्रणाली में आवंटित होने वाले गेहूं में लीकेज को राज्य सरकारें नहीं रोक पा रही हैं। सरकार के नजदीकी लोग गरीबों के निवाले को डकार रहे हैं।

मुकेश अम्बानी और गौतम अडाणी की ही कुल सम्पत्ति लगभग 20 लाख करोड़ के करीब हो चुकी है। याने भारत सरकार के एक वर्ष के बजट की आधी राशि के बराबर इन लोगों की सम्पत्ति है। वहीं वर्ष 2014 में अम्बानी की सम्पत्ति देखी जाये तो वह करीबन डेढ़ लाख करोड़ थी। गौतम अडाणी 56 हजार करोड़ के मालिक थे। 2019 में अम्बानी 4 लाख करोड़ के मालिक बन गये। अडाणी के पास सम्पत्ति 1 लाख 20 हजार करोड़ की हो चुकी थी। अम्बानी ने 4 जी के जरिये मोबाइल सेवा में प्रवेश किया था और अपनी कम्पनी को मजबूत भी बनाया था। अडाणी को भारत सरकार ने जयपुर जैसे कुछ एयरपोर्ट दे दिये।

ध्यान देने योग्य तथ्य यह भी है कि भारत अपने आभूषण का निर्यात 70 प्रतिशत अमेरिका, यूएई जैसे देशों में करता है। अमेरिका और यूएई दोनों ही देशों में भारत के मुकाबले सोना सस्ता है। अगर एक रिपोर्ट का आकलन किया जाये तो भारत में सोने की तस्करी यूएई और आसियान देशों के माध्यम से होती है। क्या अमेरिका, यूएई में ज्वैलरी के कारीगर नहीं है? अधिकांश कार्य मशीनों के माध्यम से होता है। इन तथ्यों को नजरांदाज नहीं किया जा सकता।
अब सर्वप्रथम पूछे गये सवालों की तरफ जाते हैं तो यह पता चलता है कि भारतीय मुद्रा की छपाई का कार्य या निगरानी रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया नहीं करता है। यह सच है। आरटीआई कार्यकर्ता सतीश बेरी ने आरबीआई से जानकारी मांगी तो यह बताया गया है कि एक गैर सरकारी भारतीय कंपनी भारतीय रिजर्व बैंक नोट मुद्रण प्राइवेट लिमिटेड इंडियन कंरसी की छपाई की निगरानी करती है। यह कंपनी बंगलोर से रजिस्टर्ड है। बंगलोर में इस कंपनी का मुख्य कार्यालय है। इस कंपनी की एक अन्य सहायक कंपनी है-बैंक नोट पेपर मिल इंडिया प्राइवेट। यह भी गैर सरकारी कंपनी है। हालांकि यह कंपनी शेयर बाजार के लिए रजिस्टर्ड नहीं है।

कार्पोरेट मंत्रालय के अनुसार येज़्दी हिरजी मालगाम, अरविंद गोपालराव कुलकर्णी, देवेंद्र कपूर, सनत हाजरा, मानस रंजन मोहंती, रबी तवरना, सुमन रे, नागराजन त्यागराजन भारतीय रिजर्व बैंक नोट मुद्रण प्राइवेट लिमिटेड के डायरेक्टर्स हैं अर्थात भारतीय नोट छपाई केन्द्रों में कितने नोट छापे गये, कितने छापे जाने चाहिये थे, यह लोग तय करते हैं। यह लोग सरकारी हैं या गैर सरकारी, इस संबंध में जानकारी हासिल नहीं हो पायी है।

अप्रेल 2019 के बाद 2000 के नोट की नहीं हो रही छपाई

भारतीय रिजर्व बैंक नोट मुद्रण प्राइवेट लिमिटेड ने सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत जानकारी उपलब्ध करवायी है कि वित्त वर्ष 2018-19 के उपरांत 2 हजार के नोट की छपाई नहीं हो रही है। उस वित्त वर्ष में 46 हजार 690 मिलियन नोट की छपाई की गयी थी। इसके उपरांत, पांच सौ, दो सौ और 1 सौ रुपये के नोट की छपाई हो रही है। एक मीडिया रिपोर्ट में यह जानकारी दी गयी है कि वर्ष 2016 के उपरांत दो हजार नोट की छपाई आरंभ की गयी थी और जो नोट बाजार में भेजे गये थे, वे वापिस बैंकों में नहीं आ रहे थे अर्थात ब्लैकमनी के रूप में उसको रखा जा रहा था। इस कारण नोट की छपाई बंद करने का निर्णय लिया गया था।

यूपीए से तीन गुणा ज्यादा 500 के नोट छाप रही राजग सरकार

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 8 नवंबर 2016 को नोटबंदी करते समय यह जानकारी दी थी कि भारतीय बाजार में नोटों की संख्या कम हो गयी है। डिजीटल मुद्रा को बढ़ावा दिया जाना है। आरटीआई कार्यकर्ता ने सूचना के अधिकार के तहत यह जानकारी मांगी थी कि वित्त वर्ष 2012-13 तथा 2013-14 (यूपीए सरकार) के समय तथा वित्त वर्ष 2018-19, 2019-20, 2020-21 तथा 2021-22 में पांच सौ नोटों की कितनी छपाई हुई। आरटीआई में जानकारी उपलब्ध करवायी गयी है कि वित्त वर्ष 2012-13 में 1852.514 मिलियन, अगले वित्त वर्ष में 2360.590 मिलियन, वित्त वर्ष 2018-19 में 6284.842, वित्त वर्ष 19-20 में 8227.776, 2020-21 में 6500.317 तथा गत वित्तीय वर्ष में 7713.181 मिलियन नोट (पीसेज) की छपाई की गयी। अगर सौ रुपये मुद्रा की बात की जाये तो क्रमश: वित्त वर्ष के अनुसार 4397.649, 2240.384, 5516.025, 2155.773, 2426.394 तथा 2424.086 (सभी संख्या मिलियन) नोट की छपाई हुई। सौ रुपये की मुद्रा की छपाई की तरफ कम ध्यान दिया जा रहा है और पांच सौ रुपये के नोट ज्यादा छापे जा रहे हैं। महंगाई बढऩे का एक बहुत बड़ा कारण यह भी है।

डॉ. मनमोहनसिंह ने आरबीआई का भी प्राइवेटकरण कर दिया

1990 के दशक में यह शोर मचाया गया कि भारतीय विदेशी मुद्रा भंडार समाप्त हो रहा है। यह शोर उसी तरह का था जैसे नवंबर 2016 में यह दर्शाया गया था कि नोट बहुत अधिक मात्रा में बाजार में आ गये हैं। उनकी संख्या सीमित की जानी है। प्रधानमंत्री की कमान पीवी नरसिम्हा राव के पास आ गयी थी। उन्होंने आरबीआई के पूर्व गर्वनर डॉ. मनमोहनसिंह को अपना वित्त मंत्री बनाया। विदेशी मुद्रा भंडार के शोर मचाने का लाभ यह हुआ कि सरकार ने प्राइवेटकरण की ओर कदम बढ़ा दिया। कोई शोर नहीं मचा पाया। माकपा ने विरोध किया किंतु उनको देश विरोधी ताकतें बताया गया और इस तरह से माकपा का विरोध ज्यादा असर नहीं दिखा पाया। देश में एनसीडैक्स की शुरुआत हो गयी अर्थात सोने-चांदी और जिंस पर सट्टा लगाया जा सकता था।

व्यापारियों को व्यापार से सट्टे की ओर आकर्षित कर दिया गया। कई लोग रातों रात खरबपति हो गये तो कई रातों रात खरबपति से रोडपति हो गये। याने सबकुछ लूट गया। सरकार ने एनसीडैक्स के माध्यम से सट्टे को सरकारी अनुमति दे दी। इसके उपरांत और भी अनेक कदम उठाये गये। प्राइवेट बैंकों को लाइसेंस दिये जाने लगे। 1995 को वित्त मंत्री के रूप में डॉ. मनमोहनसिंह ने 3 फरवरी 1995 को आरबीआई के प्राइवेटकरण की ओर कदम बढ़ा दिया। भारतीय रिजर्व बैंक नोट मुद्रण प्राइवेट लिमिटेड कंपनी की स्थापना की गयी। इसको बंगलोर से रजिस्टर्ड करवाया गया।

ध्यान रहे कि आरबीआई का सचिवालय मुम्बई में है किंतु कंपनी का कार्यालय बंगलोर में स्थापित किया गया। सरकार ने गठित की कंपनी को गैर सरकारी कंपनी के रूप में रजिस्टर्ड करवाया। डॉ. मनमोहनसिंह जब यूपीए के कार्यकाल में प्रधानमंत्री के रूप में वापसी करते हैं तो वे अपने अधूरे कार्य को तेज गति से आरंभ करते हैं। देश को प्राइवेटकरण की दिशा में वे तेजी से ले जाना चाहते थे। इस कारण उन्होंने 13 अक्टूबर 2010 को नयी कंपनी की स्थापना की, बैंक नोट पेपर मिल इंडिया प्राइवेट लिमिटेड। इस कंपनी का उद्देश्य अधिकाधिक नोट की छपाई करना रखा गया। इसमें 50 प्रतिशत शेयर भारतीय रिजर्व बैंक नोट मुद्रण प्राइवेट लिमिटेड के हैं। वहीं 50 प्रतिशत शेयर सिक्योरिटी प्रिंटिंग एंड मिंटिंग कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड के हैं।

अब सवाल यह उठता है कि भारतीय रिजर्व बैंक का प्राइवेटकरण किया गया तो उसका असर क्या रहा?

वर्ष 1947 में जब भारत देश आजाद हुआ तो उस समय एक अमेरिकी डॉलर की कीमत 4.16 रुपये थी। 1983 में यूएस डॉलर 10 रुपये का हुआ। डॉलर को अपनी कीमत मात्र 6 रुपये बढ़ाने में 37 साल लगे। 1990 में डॉलर 17.5 रुपये का हो गया था और 1992 को जब डॉ. मनमोहनसिंह वित्त मंत्री थे तो उस समय 25.92 रुपये का हा गया। अर्थात दो सालों में ही करीबन 8 रुपये की भारी गिरावट आ गयी थी। महंगाई ने देश में कदम बढ़ा दिया। 1996 में जब नयी सरकार के गठन का वक्त हो रहा था तो उस समय डॉलर 35.43 रुपये हो गया था। सोना जो चार-पांच हजार रुपये प्रति 10 ग्राम का था वह 10 हजार रुपये के शिखर को छू गया था। यह वह वक्त था, जब अमीर और गरीब के बीच में खाई बढऩे लगी थी।

वहीं डॉ. मनमोहनसिंह जब पीएम के रूप में वर्ष 2004 में सत्ता संभालते हैं तो उस समय डॉलर 45.32 रुपये का था। डॉलर ने अपना जादू जारी रखा और वर्ष 2013 में सरकार की विदाई के वक्त डॉलर 56.57 रुपये का हो गया था। अर्थात 10 सालों के भीतर 11 रुपये की गिरावट आ चुकी थी। वर्ष 2014 के बाद तो गति बढ़ती गयी और 8 सालों के भीतर ही करीबन 25 रुपये की गिरावट आ चुकी है। डॉलर 80 या इससे ऊपर बना हुआ है।

 

क्यों गिर रहा है रुपया?

कच्चा तेल जिसको क्रूड ऑयल के नाम से भी जाना जाता है, वह भी एनसीडैक्स में पंजीबद्ध है। इस ऑयल का सौदा देश के बढ़े व्यापारी करते हैं। उनके पास कुएं नहीं है। अर्थशास्त्र के एक जानकार ने बताया कि बिटकॉइन, क्रूड ऑयल और डॉलर का एक अपरोक्ष रिश्ता है। यह कालाबाजारी का एक बड़ा माध्यम है। रिलायंस, एस्सार जैसी कंपनियां तेल के व्यापार में सक्रिय हैं। यह कंपनियां बाहर से तेल खरीद करती हैं और उनको सरकारी व गैर सरकारी क्षेत्र में बेचती हैं। जैसे ही डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर होता है, उसी समय कंपनियां अपना रेट बढ़ा देती हैं। प्राइवेट क्षेत्र में इनकी बिक्री भले ही कम हो, लेकिन सरकारी क्षेत्र इन कंपनियों से तेल आदि की खरीद करता है और इस तरह से इन कंपनियों को भारी लाभ पहुंचता है। यह गरीब को गरीब और अमीर को और अमीर बनाने का बढ़ा गेम है।

पाकिस्तान की कुल आबादी से ज्यादा देश में लोग कुपोषित

अगर हम पाकिस्तान से अपनी जीडीपी की तुलना करते हैं तो सामने आता है कि भारत एक मजबूत देश है। पाक हमारे सामने कहीं नहीं ठहरता। भारत के बड़े महानगरों में आधुनिक परिवहन प्रणाली है। डिजीटल और आधुनिक क्षेत्र में दक्षिण एशिया में भारत देश का कोई मुकाबला नहीं कर सकता। वहीं एक सच यह भी नहीं भूलना चाहिये कि देश में करोड़ों लोग बेघर हैं। करोड़ों लोग ऐसे हैं, जिनको दो वक्त का भोजन मुश्किल से मिलता है। ऐसी संख्या पाकिस्तान की कुल आबादी से कहीं ज्यादा है। अडाणी-अम्बानी या टाटा-बिरला को नहीं देखा जाना चाहिये, इन गरीब लोगों की हालत को भी ध्यान रखना चाहिये। जो सरकारी नीतियों के कारण मुख्य धारा में नहीं आ पा रहे हैं। महंगाई उनकी कमर पर ऐसा चाबुक चला रही है कि उनकी पीढ़ा सुनने वाला भी कोई नहीं है।

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